Geet / Ghazal

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लोग बदलते जा रहे है
आम आदमी हुआ है बूढ़ा, नेता हुए जवान
जनता को ये बेच रहें हैं, जैसे हो बाज़ार 
खद्दर धारी बेच रहें हैं, फिर से हिंदुस्तान.....
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राजा और रंक
बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना है|
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मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
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अपने-पराए
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
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कदम मिलाकर चलना होगा
असफल, सफल समान मनोरथ, सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पारस बनकर ढलना होगा, कदम मिलाकर चलना होगा.
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कोई क्या कहेगा ?
खो देते हैं इससे, वे कई पल और खुशियां
जिनसे संवर सकता था, और अधिक
घर-संसार, व्यवहार हमारा।
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गर्दिशों का दौर
कांटों के बीच उम्रभर हंसते रहे हैं हम
हंसते थे जो हमारे बुरे वक्त में लोग
गर्दिश का दौर उनपे भी आया तो रो दिये ।।
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अश्कों का सहारा
अपनों में भी गैर नजर  आते हैं ,
तूफां के साये मेें शूलों पे गुजारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।
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पर्यावरण जागरूकता
संतुलन बिगड़ जाता है जब
बनते भूकंप आंधी तूफान सुरसा
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।
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क्या हैवान बनेगा
बच्चे अनाथ होंगे, पत्नी विधवा होगी,
जवानी में मरेगा, कहां बुढ़ापे का सुख मिलेगा,
ऐ पीने वाले बता, तुझे पीके क्या मिलेगा ?
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