ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना


ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना

भारत में महानगरों से लेकर ज़िलों में ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना खुला हुआ है, जिसे हम अंग्रेज़ी में यूनिवर्सिटी और हिन्दी में विश्वविद्यालय कहते हैं. इस कारखाने की ख़ूबसूरती यही है कि जिसकी ज़िंदगी बर्बाद होती है उसे फर्क नहीं पड़ता. 
ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना आपने देखा है? भारत में महानगरों से लेकर ज़िलों में ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना खुला हुआ है, जिसे हम अंग्रेज़ी में यूनिवर्सिटी और हिन्दी में विश्वविद्यालय कहते हैं. इस कारखाने की ख़ूबसूरती यही है कि जिसकी ज़िंदगी बर्बाद होती है उसे फर्क नहीं पड़ता. जो बर्बाद कर रहा है उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ता. उत्तर प्रदेश के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी में इस साल बीए और एमए के 80 फीसदी छात्र फेल हो गए हैं. जिस यूनिवर्सिटी में चार लाख से अधिक छात्र फेल हो जाएं वो दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर होनी चाहिए. क्या आपने सुना है कि ऑक्सफोर्ड, हावर्ड, मिशिगन यूनिवर्सिटी के 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए? और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है.

छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों ?

उत्तर प्रदेश के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी में इस साल बीए और एमए के 80 फीसदी छात्र फेल हो गए हैं. जिस यूनिवर्सिटी में चार लाख से अधिक छात्र फेल हो जाएं वो दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर होनी चाहिए. हिन्दी अखबारों के स्थानीय संस्करण में विश्वविद्यालय इस बात का श्रेय ले रहा है कि इस बार वीडियो कैमरे लगा कर नकल रोक दी गई, इसलिए इतने छात्र फेल हो गए हैं. मूर्खता की हद न होती तो विश्वविद्यालय प्रशासन इस तरह के दावे नहीं करता. आखिर इस यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में पढ़ाई का स्तर इतना ख़राब क्यों है कि बिना नकल की परीक्षा होने पर 80 प्रतिशत छात्र फेल कर जाएं. उस यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर, प्रिंसिपल, प्रोफेसर और लेक्चरर फिर किस लिए आते हैं. क्या यहां फेल होने की पढ़ाई होती है? यह भारत ही नहीं विश्व के शिक्षा जगत की भयंकर घटना है, जिसे भूकंप और सूनामी की तरह कवर किया जाना चाहिए था. इसीलिए मैंने कहा कि भारत में यूनिवर्सिटी के नाम पर कस्बों से लेकर महानगरों तक में छात्रों को बर्बाद करने का कारखाना खुला हुआ है.

फ़ैज़ाबाद में है ये डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी. इस यूनिवर्सिटी में ज़्यादातर गर्वनमेंट एडेड और प्राइवेट कॉलेज हैं. इनकी संख्या 600 से अधिक बताई जाती है. कई कॉलेज ऐसे हैं जहां 10,000 से लेकर 20,000 तक छात्र पढ़ते हैं. 2017-18 में बीए बीएससी, बीकॉम के तीनों साल के और पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के सवा छह लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी. 80 प्रतिशत फेल हो गए तो इस हिसाब से फेल होने वाले छात्रों की संख्या करीब 4 लाख 80,000 के करीब छात्र फेल हैं. बीएससी थर्ड ईयर के 80 प्रतिशत से अधिक छात्र फेल हैं. बीएससी प्रथम वर्ष में 56 प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं. सुल्तानपुर के गनपत सहाय पोस्ट ग्रेजुएट महाविद्यालय के गणित में फाइनल ईयर में करीब 300 छात्र थे लेकिन इनमें से मात्र 20-25 छात्र पास हुए हैं. 275 के करीब फेल हो गए हैं. एक छात्र ने बताया कि 300 छात्रों के लिए एक परमानेंट प्रोफेसर हैं और दो एडाहक हैं. फाइनल ईयर में गणित में चार पेपर होते हैं. आप इससे भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि नौजवानों के जीवन के साथ किस तरह का खिलवाड़ हो रहा है. इस कॉलेज में 18000 से अधिक छात्र पढ़ते हैं. अगर स्थायी शिक्षक नहीं होंगे, उन्हें अच्छी तनख्वाह नहीं मिलेगी तो पढ़ाएगा कौन.

नकल रोक

नकल रोक देने का श्रेय लेना आसान है, लेकिन क्या सिर्फ नकल रोकी गई या फिर परीक्षा में आखिरी वक्त में बदलाव किया गया. यह भी एक गंभीर सवाल है. बीए और एमए का छात्र ऑब्जेक्टिव टाइप जवाब देकर निकलेगा तो फिर उच्च शिक्षा का मतलब क्या हुआ. कई शिक्षकों ने पहचान गुप्त रखते हुए बताया कि छात्रों को ऑब्जेक्टिव सिस्टम का कोई अभ्यास नहीं था. वैसे भी भूगोल और जीव विज्ञान का छात्र बिना रेखा चित्र बनाए, विस्तार से समझाए कैसे साबित करेगा कि उसे विषय का ज्ञान हुआ है. गणित में नंबर इस बात के भी मिलते हैं कि आखिर तक सवाल के हल करने का रास्ता कितना सही था सिर्फ आखिर हल पर ही नहीं मिलते हैं. लेकिन फेल होने वाले ज्यादातर छात्र तीसरे वर्ष के हैं, जहां पहले की तरह ही प्रश्न पछे गए. यह सारी जानकारी छात्रों से मिली है. 

क्या आपको यह सुनकर हैरानी नहीं हुई कि एक ग़रीब राज्य की यूनिवर्सिटी दोबारा कॉपी चेक करने के लिए 3000 रुपये लेती है. एक कॉपी के तीन हज़ार. अगर किसी छात्र को तीन कॉपी की जांच करानी है तो उसे 9000 देने होंगे. इस हिसाब से 4 लाख छात्रों ने दोबारा जांच के आवेदन किए तो यूनिवर्सिटी के पास इन गरीब छात्रों की जेब से निकल कर 120 करोड़ आ जाएंगे. क्या ये डकैती नहीं है? अवध यूनिवर्सिटी के कॉलेज जिन इलाकों में हैं वहां के ज़्यादातर छात्र ग़रीब या साधारण परिवारों के हैं. उनके लिए 3000 की राशि बहुत है. यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर साफ साफ लिखा है कि उत्तर पुस्तिका के अवलोकन से असंतुष्ट छात्र उत्तर पुस्तिका मिलने की तारीख से 15 दिन के अंदर 3000 रुपये प्रति प्रश्नपत्र की दर से शुल्क का भुगतान कर चैलेंज इवेलुएशन के लिए आवेदन कर सकेगा. 

यही नहीं नंबर देने और बदलने की शर्तें भी कॉपी जटिल हैं यानी तय है कि छात्र के 3000 भी डूबेंगे. क्या जानबूझ कर युवाओं को इस तरह से बर्बाद किया जा रहा है ताकि वे सिर्फ और सिर्फ व्हाट्स एप के प्रोपेगैंडा को ही ज्ञान समझ सकें. ये सवाल भारत के नौजवानों को खुद से पूछना है. वर्ना यूनिवर्सिटी की हालत देखकर एक सिद्धांत बिना नोबेल लिए यहीं प्रतिपादित कर सकता हूं कि अगर किसी देश की जवानी को आसानी से बर्बाद कर देना है तो वो भारत है. बस नौजवानों को आप किसी यूनिवर्सिटी में भेज दीजिए. जो छात्र साल भर की फीस 4000 देता है वो कॉपी दोबारा चेक कराने के लिए 21000 देगा क्या यह अन्याय नहीं है. अगर यह अन्याय और डकैती नहीं है तो फिर क्या है.

छात्रो ने ही जानकारी भेजी है, और खुद ही रिकॉर्ड कर भेजा है. हमारे सहयोगी प्रमोद श्रीवास्तव ने बताया कि कई मार्कशीट देखने पर पता चलता है कि छात्र को एक पेपर में 75 में 60 नंबर आए हैं मगर दूसरे पेपर में ज़ीरो आया है. अगर गड़बड़ी नहीं है तो फिर रजिस्ट्रार और परीक्षा नियंत्रक को क्यों हटाया गया. अव्वल तो ऐसी गड़बड़ी हुई क्यों. अगर रिजल्ट सही नहीं हुए तो बीए पास कर प्रतियोगिता परीक्षा में जाने वाले और आगे पढ़ने वाले छात्रों का क्या होगा. उनके करियर के साथ ये खिलवाड़ क्यों हो रहा है. आपको बिहार यूनिवर्सिटी का हाल तो पता ही होगा जहां 2017 के साल में एक भी परीक्षा नहीं हुई. मुमकिन है वहां के छात्र भी साल भर व्हाट्स अप हिन्दू मुस्लिम प्रोपेगैंडा में व्यस्त और मस्त होंगे. वैसे हमने अपनी यूनिवर्सिटी सीरीज़ में 17 अक्तूबर को इस राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी का हाल बताया था. 

अयोध्या के सबसे बड़े कॉलेज कामता प्रसाद सुंदर लाल साकेत पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में करीब 11000 छात्र-छात्राएं रजिस्टर्ड थे. यहां 145 रेगुलर शिक्षक होने चाहिए थे, मगर उस वक्त 85 ही थे. 85 शिक्षकों पर 11000 छात्रों को पढ़ाने का करिश्मा सिर्फ उस भारत में हो सकता है जहां मंत्रियों के बच्चे कभी पढ़ने नहीं आते हैं. उनके बच्चे वहां पढ़ने जाते हैं जहां 20 छात्रों पर एक प्रोफेसर होता है. शिक्षक बताते हैं कि कई कॉलेजों में कागज पर शिक्षकों की संख्या पूरी मिलेगी मगर वे वहां होते ही नहीं हैं. यह भी एक किस्म का घोटाला है. एडेड कॉलेज में बहुत से परमानेंट शिक्षक पढ़ाते तो हैं मगर मैनेजमेंट जिन शिक्षकों को 15-20 हज़ार की सैलरी पर रखता है उनकी दिलचस्पी नहीं होती और न ही योग्य होते हैं. यह भी सोचिए कि 20,000 की सैलरी पर पढ़ाने वाले लेक्चरर की क्या गुणवत्ता होगी. सोचिए वरना बहुत देर हो जाएगी और ऐसे कॉलेज करोड़ों नौजवानों को हमेशा के लिए बर्बाद कर चुके होंगे. 

इससे पहले कि घर-घर में नौजवान तीन-तीन साल यूनिवर्सिटी में गुज़ारने के बाद किसी लायक न बनें, हम अपने सवाल बदल लें. नेताओं ने नौजवानों को कीचड़ में फेंक दिया है. नौजवान उस कीचड़ से अपनी बर्बादी की होली खेल रहा है. आप कब पूछेंगे कि 6 एम्स में 70 फीसदी शिक्षक नहीं हैं. बिना टीचर के एम्स जैसे संस्थानों से आपका बच्चा किस टाइप का डॉक्टर बन कर निकल रहा है. सोचिए एम्स जैसे संस्थानों में चुने जाने के लिए कितना परिश्रम करना होता है. आप सोचिए क्या वह भारत बेहतर हो सकता है जिसके नौजवानों को, जिसकी जवानी को बर्बाद करने की फैक्ट्रियां खुली हुई हैं.

समस्याएँ एवं भविष्य

आज के विश्वविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयीय शिक्षा की अनेक समस्याएँ हैं जिनपर शासन तथा शिक्षाविदों का ध्यान केंद्रित है। माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के प्रसार के कारण विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की सख्या बढ़ रही है और प्रश्न यह है कि क्या विश्वविद्यालय उन सभी विद्यार्थियों को स्थान दें जो आगे पढ़ना चाहते हैं, अथवा केवल उन्हीं को चुनकर लें जो उच्च शिक्षा से लाभ उठाने में समर्थ हों? शिक्षा का माध्यम क्या हो?, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। शोध कार्य को प्रश्रय देने की समस्या भी ध्यान अकर्षित करती है। कुछ विश्वविद्यालयों मे विद्यालयों में विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता भी एक समस्या है। योग्य अध्यापकों को विश्वविद्यालय में आकर्षित करना तथा उन्हें बनाए रखना कम महत्वपूर्ण नहीं। देश की वर्तमान दशा को देखते हुए तथा हमारा आज व कल की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किस प्रकार के पाठ्यविषय प्रारंभ किए जाएँ और आगे के विश्वविद्यालयों का क्या रूप हो? ये प्रश्न राष्ट्रोत्थान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

कहीं जर्जर कॉलेज, तो कहीं बदहाल छात्रावास, क्या यही है शिक्षा का हाल ?

सरकार ने चरणबद्ध तरीके से राज्य में 100 कॉलेज खोलने का निर्णय लिया है. 30 कॉलेजों में पठन-पाठन शुरू भी कर दिया है. नये कॉलेज बनाकर सरकार वाहवाही लूट रही लेकिन पुराने कॉलेजों की बदहाल स्थिति पर चुप्पी है.रांची कॉलेज का पीजी छात्रावास जहां अभी भी छात्र अपने जान दांव पर लगाकार रहने के लिए मजबूर हैं, तो दूसरी तरफ बुंडू में पीपीके कॉलेज का हाल भी कुछ ऐसा ही है. प्रयोगशाला व पुस्तकालय तो दूर की बात है, यहां तो विद्यार्थियों को बैठने के लिए भी समुचित कमरे ही नहीं हैं.  

ये सिर्फ दो उदाहरण नहीं है ऐसे कई उदाहरण राज्य में भरे पड़े हैं. छत सहित दीवारों की हालत काफी  खराब है. छत कभी भी गिर सकती है. इतना ही नहीं छात्रावास में बिजली, पेयजल व स्नान करने  के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है.  छात्रों को स्नान करने के लिए बाहर जाना पड़ता है. सुरक्षा नहीं हैं. गेट टूटा हुआ है. प्रभात खबर डॉट कॉम ने पीजी छात्रावा के खराब हालात की खबर उस वक्त आप तक पहुंचायी थी जब नैक की टीम विवि के मुल्याकांन के लिए रांची में थी. आज भी स्थिति बदली नहीं है. छात्र उसी तरह खतरे में रह रहे हैं

बुंडू में पीपीके कॉलेज का हाल बुरा है विद्यालय में कुल 14 कमरे हैं. पर ऊपर के सात कमरे में पढ़ाई नहीं हो सकती. ऊपर के तीन कमरे की छत गिर गयी है. अन्य चार कमरों की स्थिति काफी जर्जर है. इस कारण इन्हें सील कर दिया गया है. ग्राउंड फ्लोर का भवन भी काफी जर्जर है. पंच परगना क्षेत्र में रांची  विवि का यह  एकमात्र कॉलेज है. कॉलेज में 11 हजार छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं. 

विवि के अधिकारी इस कॉलेज का कई बार निरीक्षण भी कर चुके हैं. इसके  बावजूद यहां की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है.  कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य डॉ जयराम महतो कहते हैं, क्षेत्र के एकमात्र डिग्री कॉलेज के प्रति सरकार उदासीन है. कुलपति को परिस्थिति से अवगत कराया जा चुका है. दर्जनों बार सांसद,  मंत्री, विधायक व रांची विश्वविद्यालय प्रशासन के वरीय अधिकारी कॉलेज का दौरा करने पहुंचे, भवन के निर्माण का आश्वासन भी दिया, पर अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई.शिक्षा व्यवस्था में सुधार तभी संभव है जब छात्रों को पढ़ने और् रहने के लिए उचित व्यवस्था हो.


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