क्यों उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारत में खदेड़ा जाता है?


क्यों उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारत में खदेड़ा जाता है?

यह कितनी बुरी बात है कि आज़ादी के इतने बरस बाद भी भारत में लोग भाषा और प्रदेश के नाम से जाने जा रहे हैं। भारतीय होने से पहले लोगों को उनकी भाषा और  रहन सहन  से पहचान देकर यहाँ से वहां खदेड़ा जाता है। भाषावाद और क्षेत्रवाद की  जिस आग को हवा दी जा रही है, उसमे एक सहज सवाल उठता है कि ऐसे में मध्यप्रदेश कहाँ रहेगा ?

क्यों उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारत में खदेड़ा जाता है?

यह कितनी बुरी बात है कि आज़ादी के इतने बरस बाद भी भारत में लोग भाषा और प्रदेश के नाम से जाने जा रहे हैं। भारतीय होने से पहले लोगों को उनकी भाषा और  रहन सहन  से पहचान देकर यहाँ से वहां खदेड़ा जाता है। केंद्र सरकार मौन है और उसके सामने ताल ठोंक, प्रतिपक्ष इसी भावना को हवा दे रहा है। उसका उद्देश्य सरकार बदलना है, पर जो रक्त बीज वो बो रहा है उसकी फसल कैसी होगी सब जानते हैं ? भाषावाद और क्षेत्रवाद की  जिस आग को हवा दी जा रही है, उसमे एक सहज सवाल उठता है कि ऐसे में मध्यप्रदेश कहाँ रहेगा ? जिसमें हर भाषा भाषी और हर क्षेत्र के लोग है। भाषाओँ के इस गुलदस्ते के साथ यह समस्या है कि वो अपनी पहचान किस भाषा या प्रान्त से जोड़े।

बहुत लंबे समय से उत्तर प्रदेश और बिहार के मूल निवासियों पर देश के अलग-अलग भागों में हमले हो रहे हैं। असम के तिनसुकिया इलाके में 2015 में संदिग्ध उल्फा आतंकवादियों के हाथों एक हिंदी-भाषी व्यापारी और उसकी बेटी की हत्या कर दी गयी थी। यह शुरुआत थी। दरअसल, जब भी किसी को अपनी ताकत दिखानी होती है, वह निर्दोष हिंदी भाषियों को ही निशाना बनाने लगता है। यह देश के संघीय ढांचे को ललकराने के समान है। यह स्थिति हर हालत में रुकनी ही चाहिए. इसे न रोका गया, तो देश बिखराव की तरफ बढ़ेगा।

गुजरात में अभी जो हिंसा हो रही है, उसमें हिंदी भाषी लोगों के साथ असमिया, मणिपुरी, उड़िया और बंगाली भी पिट रहे है। महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता और उसके कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के साथ कभी भी मार-पीट करने से बाज नहीं आते। वे इन प्रदेशों के नागरिकों को ‘बाहरी’ कहते हैं। 

यह प्रमाणित तथ्य है कि सिर्फ समावेशी समाज ही आगे बढ़ते हैं। अमेरिका इसका उदाहरण है। इस मामले में पूरा विश्व अमेरिका को अपना आदर्श मानता है। उसकी यह स्थिति इसलिए बनी, क्योंकि वहां पर सबके लिए आगे बढ़ने के समान अवसर हैं। वहां पर दुनिया के कोने-कोने से लोग आकर बसते हैं और अमेरिकी हो जाते हैं। 

हम भारत में पैदा होकर भी भारतीय होने से पहले कुछ और होते हैं। ऐसा क्यों हैं ?

जो लोग इस मामले को किसी क्षेत्र विशेष के लोगों से जोड़कर देख रहे हैं, वे अपनी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचय दे रहे हैं। ये देश ‘हम’ और ‘तुम’ के हिसाब से नहीं चलेगा। अगर इस तरह से कोई चलाने की मंशा रखता है, तो उसे हम सबको नकारना चाहिए। किसी के साथ  भारत में कहीं भी उसकी जाति, धर्म, रंग आदि के आधार पर भेदभाव किया जाना असहनीय है। हिंदी भाषियों के साथ जो हो रहा है, इस मानसिकता पर तुरंत रोक लगाना जरूरी है। देश को कानून के रास्ते से नहीं चलाया गया, तो अराजकता की स्थिति पैदा हो जायेगी।

यह देश सबका है, यहां के संसाधन हर भारतीय के हैं। साथ ही मध्यप्रदेश जैसा राज्य जो विभिन्न भाषाओँ का गुलदस्ता है को अपने यहाँ रोजगार के वृद्धि करना चाहिए जिससे उसके युवा किसी अन्य राज्य में नौकरी के लिये न भटके। घुन की तरह मध्यप्रदेश के युवा हर बार पिसते हैं। हाल की  हिंसा से गुजरात का हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है। जीआइडीसी के अध्यक्ष राजेंद्र शाह के अनुसार, गुजरात में 70 प्रतिशत से ज्यादा श्रमिक हिंदी भाषी भारतीय हैं, जिनमें मध्यप्रदेश से भी हैं। वहां दंगा किसने भड़काया यह भी जान लेना जरूरी है। इस शख्स का नाम है अल्पेश ठाकोर, जो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का राष्ट्रीय सचिव और राहुल गांधी का चहेता है। अल्पेश खुद को गुजरात का राज ठाकरे बनाना चाहता है।

एक व्यक्ति के अपराध के लिए पूरा समाज दोषी क्यों : 

दरअसल, गुजरात के साबरकांठा जिले में 28 सितंबर को 14 वर्षीय बालिका के साथ दुष्कर्म के मामले में एक बिहारी युवक को गिरफ्तार किया गया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि गुनाहगार को उसकी सजा जरूर मिलनी चाहिए, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक व्यक्ति के अपराध के लिए पूरे समाज अथवा समुदाय को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? कैसे उन्हें अपनी रोजी-रोटी और रोजगार से बेदखल किया जा सकता है? इस बात की क्या गारंटी है कि प्रतिहिंसा में बिहार और उत्तर प्रदेश में रह रहे गुजरातियों को निशाना नहीं बनाया जाएगा?

एक घटना ने लिया विकराल रूप : 

साबरकांठा जिले की एक घटना ने गुजरात के 6 जिलों को अपने आगोश में ले लिया। हिंसा का ऐसा तांडव हुआ कि बिहारी और उत्तर भारतीय लोग स्थानीय लोगों के निशाने पर आ गए और उन्होंने जिंदगी बची रहने का फैसला लेते हुए गुजरात छोड़ने का फैसला लिया। इन 6 जिलों में पुलिस ने 42 मामले दर्ज किए हैं और अब तक 431 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

50 हजार लोग छोड़ चुके हैं गुजरात : 

बिहारी और उत्तर भारतीयों को गुजरात के लोगों ने धमकी दी है कि यदि 10 अक्टूबर तक उन्होंने गुजरात नहीं छोड़ा तो उनके हाथ-पैर काट दिए जाएंगे। इस धमकी के बाद अब तक 50 हजार लोग गुजरात से कूच कर गए हैं। गुजरात में कोई 5 साल से नौकरी कर रहा था तो कोई 15 साल से, लेकिन धमकी के बाद ये लोग अपनी जान की खातिर वहां से रवाना हो रहे हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन में गुजरात में ऐसा माहौल नहीं देखा, जो अब देखने को मिल रहा है।

मेहसाणा में 200 परिवारों ने घर खाली किए : 

स्थानीय लोगों की धमकी के कारण बिहार और उत्तर भारत के रहने वाले 200 परिवारों ने मेहसाणा में अपने घर खाली कर दिए हैं और वे अपने अपने गृहनगर लौट गए हैं। ये सभी लोग बहुत डरे और सहमे हुए थे। इन सभी का एक ही कहना था कि क्या बिहारी होना सबसे बड़ा गुनाह है? हालांकि पुलिस सभी प्रभावित जिलों में लोगों को सुरक्षा देने का आश्वासन दे रही है, लेकिन इसका कोई असर उन पर नहीं पड़ रहा है।

उत्तर भारतीय लोगों पर हमले को लेकर राजनीति भी गरमाई : 
गुजरात में बिहारियों पर कहर टूटने के बाद राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का आरोप है कि गुजरात में हो रही हिंसा की जड़ वहां के बंद पड़े कारखाने और बेरोजगारी है। व्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों चरमरा रही हैं।

उत्तर भारत एक बोझ है दक्षिण भारत पर

बोझ तो नही कह सकते हैं। मगर उत्तर भारत का विकास काफी धीमी गति से होती रही है। इस कारण सारे देश की गति धीमी दिखती है।दक्षिण के राज्यों में विकास की गति काफी ज्यादा रही है। और महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण के राज्य देश का विकास इंजन मने जाते हैं। उत्तर में पंजाब, दिल्ली, बंगाल, आदि चुभे हुए राज्य तेज गति से विकास कर पा रहे हैं। फिर भी किसी राज्य को बोझ नही कह सकते केवल पिछड़े राज्य कह सकते हैं।

हमें तो ऐसा नही लगता। उल्टा हम तो ये मानते हैं कि जितने राज्यों का विकास हुआ है उसमें उत्तर भारतीयों का भारी योगदान है। सबसे कठीन परिश्रम करना और कम आमदनी में बहुत असुविधाजनक जिंदगी जीने का बीड़ा सिर्फ यही लोग उठा रहे हैं। गुजरात में आग की भट्ठी (कास्टिंग या फोर्जिंग ) के ज्यादातर मजदूर उत्तर भारतीय है। हमारे मुंबई में ज्यादातर सब्ज़ियां बेचने वाले यही लोग है जिससे लोग ५ या १० रुपए के लिए भावताल करते हैं। जब की यही भावताल करने वाले लोग ८०० या १००० रुपए वाले डिश अच्छे होटल में खाने जाते हैं तो १०० टिप देकर आते है। एक उत्तर भारतीय कि छोटी सी होटल में लोग सेवापुरी,भेल, सेंडविच या गोलगप्पे खाते है। खाने के बाद तकरीबन सभी कुछ ना कुछ मुफ्त का ज़रुर खाते है, जैसे कुरमुरा, पुड़ी वगैरह। ये यहां का चलन ही है। अब बताइए कोई गुजराती आप को फाफड़ा या ढोकला खिलाने के बाद कुछ मुफ्त देगा?? क्या साऊथ इंडियन इडली सांभर खिलाने के बाद कुछ मुफ्त देगा?? वास्तव में उत्तर भारतीय लोग सिधेसादे और सरल होते हैं। ये कुछ बुरे या ग़लत लोग हर राज्य और हर समाज में होते हैं। ये बड़े और पिछड़े राज्य है।

ये राज्य पिछड़े ज़रुर है। इस की जिम्मेदारी केंद्र और खास तौर पर राज्य सरकार की है।मान लिजिए उत्तर प्रदेश के कन्नौज में इत्र का बहुत बड़ा कारोबार है। तो इस को पुरे देश दुनिया में कैसे पहोंचाया जाये या इस की ब्रांडिंग कैसे करें ये देखना सरकार का काम हैं। शिक्षा को बढ़ावा देने भी जरूरी है। उत्तर भारत ही राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की भुमि है। मैंने एतिहासिक, राजनीतिक या धार्मिक सबसे बेहतरीन किताबें जो पढि है वो ज्यादातर उत्तर भारतीय लेखकों की लिखी हुई है।

मुझे लगता है कि अगले एक दशक में उत्तर भारत की स्थिति बदलने वाली है। और एकबार उत्तर भारत की जिडिपि ने रफ्तार पकड़ी तो पूरा देश उत्तर भारतीयों को मिस करेगा।

बिहार की अर्थव्यवस्था 

बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है परंतु हर साल कोसी नदी में आने वाली बाढ़ से लाखों किसानों की फसल और आजीविका नष्ट हो जाती है। घर-बार, आम जन-जीवन सभी भयंकर रूप से प्रभावित होते हैं। विडंबना यह है कि 70 साल से नारे लगाने वालों और सत्तर साल तक राज्य और केंद्र में काबिज़ मुख्तलिफ सरकारों को आज तक इस विकट परिस्थिति ने अपनी ओर आकर्षित नहीं किया। ये बात समझने लायक है कि यह सिर्फ बाढ़ है, कोई धर्म या जाति नहीं जो वोट बैंक बने। हमारे देश मे जो वोट बैंक नहीं होते वो मुद्दे नहीं होते, ना तो ये संचार तंत्र में जगह बना पाते हैं, ना ही किसी पार्टी के चुनावी मेनिफेस्टो में।

आज़ादी के बाद से और 1990 के पहले बिहार में अधिकतम समय तक अस्थिर सरकारें रहीं जिसकी वजह से बिहार का औद्योगीकरण और विकास दूसरे राज्यों के मुकाबले बिल्कुल नहीं हुआ। 1990 से अब तक बिहार में जिन जातीय पार्टियों का वर्चस्व रहा और आज भी जिन्हें सत्ता मयस्सर है, उन्होंने बिहार की शिक्षा व्यवस्था खोखली कर डाली, जिसका नमूना हर साल सुर्खियां बटोरता है। उन्होंने ही राज्य में अपराध को सामान्य बना दिया और जंगल राज्य की स्थापना की, जो अब तक कायम है। ओछी राजनीति और प्रकृति की दोहरी मार झेल रही त्रस्त जनता आखिर क्या करे। क्या वो अपने भूख की ज़द में आकर दम तोड़ दे या फिर अपने लिए कहीं और अच्छे अवसर तलाशे? क्या उनका अवसरों की तलाश दूसरे राज्यों के नागरिकों की रोज़गारो पर अधिग्रहण है? क्या बिहार के लोगों को एक अच्छी शिक्षा का अधिकार नहीं जो वहां की सरकार उसे उपलब्ध कराने में पूर्णतः असफल रही है?

क्या हिंदुस्तान में 'बिहारी' होना इतना बड़ा गुनाह है?

बिहार के मुख्यमंत्री अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने से पूर्व, जनता की बदहाली की भी आवाज़ें सुनकर बिहार के लिए विषेश राज्य की मांग करते थे। अब उनके अचानक हुए हृदय परिवर्तन ने उनकी मांग की ध्वनि पिछले दो वर्षों में मंद कर दी। बिहार को ज़रूरत है विशेष राज्य के दर्ज़े की, अपनी अर्थव्यवस्था और विकास काे आगे ले जाने के लिए। कोई भी मनुष्य अपने घर-बार से लगाव और जुड़ाव को छोड़कर नहीं जाना चाहता, परंतु बदहाली उसे मजबूर कर देती है पलायन के लिए, जिसकी व्यथा सिर्फ वो ही जानता है।

जिस खूबसूरत महानगरों में रहने का आप दम्भ भरते हैं, जिन बड़ी-बड़ी इमारतों और फ्लाईओवर को देखकर आप फूले नहीं समाते, वो सब जिन मेहनतकश मज़दूरों के परिश्रम के खून पसीने से आते हैं, आप उन्हें ही नहीं अपनाते। ट्रेन के ट्रेन मज़दूरों की भीड़ बिहार से महानगरों को स्वप्नों की नगरी बनाने निकलती है, स्वयं झुग्गियों में रहकर हज़ारों महल रोज़ बनाते हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है गालियां, धिक्कार, अपमान।

क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा फैलाने वालों को राजनीतिक शह 

उस मुल्क की कल्पना कितनी भयावह होगी जहां भीड़ ही न्याय और कानून को संचालित करने की संस्था बन जाए। भीड़ ही सत्ता और न्यायिक तंत्र के समानांतर खड़ी हो जाए। लोकतंत्र को अधिग्रहित करने से लेकर संविधान की प्रस्तावना भी भीड़ ही तय करने लगे। मेरे ख्याल से उस देश का भविष्य सीरिया, गाज़ा, इराक और बनाना रिपब्लिक से भी भयावह होगा। गुजरात में क्षेत्रवादी ताकतें भीड़ में तब्दील होने लगी है। बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों के नागरिकों को गुजरात से भगाया जा रहा है। पलायनवादियों को यह दलील देकर खदेड़ा जा रहा है कि एक बिहारी ने किसी बलात्कार की घटना को अंजाम दिया है, इसलिए सभी उत्तर भारतीयों को भगाया जाए।

यहीं स्थिति बीते कुछ साल पहले महाराष्ट्र में हुई थी जहां उत्तर भारतीयों पर बर्बरता के साथ हिंसक हमले हुए। उनके रोजी-रोज़गार के स्थाई स्रोतों को नष्ट किया गया। वहां क्षेत्रवादी अराजकों द्वारा दलीलें दी गई कि उत्तर भारतीय महाराष्ट्र में गंदगी फैलाते हैं। प्रदेश के हक को उत्तर भारतीय पलायन कर लूट लेते हैं। क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा फैलाने वाले अराजकों को हर बार राजनीतिक शह प्राप्त होती है जिसे लेकर मेरे ज़हन में कुछ चिंताएं हैं।

मेरी चिंता सबसे पहले गुजरात में उत्तर भारतीयों को भगाने के संदर्भ में है जहां हमलावरों द्वारा दलीलें पेश की गई कि एक बिहारी ने बलात्कार किया है इसलिए इन्हें प्रदेश से भगाया जा रहा है। हमलावरों की दलीलों पर मेरी चिंता यह है कि क्या किसी एक के कुकृत्य करने पर उसकी सज़ा सबको दी जानी चाहिए? यदि नहीं, फिर तो किसी एक बिहारी की वजह से पूरे उत्तर भारतीयों को बलात्कारी की संज्ञा देकर भगाना कितना न्यायसंगत है। यदि इसका जवाब हां हैं फिर तो उसी गुजरात राज्य से ललित मोदी, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी भी नागरिक हैं फिर क्या हमलावरों के तर्क के आधार पर तमाम गुजराती नागरिकों पर संदेह करना न्यायसंगत है।

मेरी नज़रों में तो बिलकुल नहीं, क्योंकि किसी इक्के-दुक्के के ओछापन की वजह से किसी समाज,धर्म, राज्य और राष्ट्र की गरिमा पर आंच नहीं आ सकती। वजह शर्मनाक इसलिए भी प्रतीत होती है, क्योंकि यह सारी स्थितियां राजनीतिक रणनीति के छांव में तैयार की जाती है। क्षेत्रीयता के चेतनाओं को अन्य क्षेत्रीय नागरिकों के खिलाफ ज़हर फैलाकर एकत्रित करने की धारणा एक प्रगतिशील मुल्क के बर्बादी की सबसे बड़ी वजह होती है।

इस सम्पूर्ण विषय पर मैं संविधान की कुछ बुनियादी बातों को भी यहां ज़िक्र करना चाहूंगा। संविधान के ‘भाग 3 मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 15′ में स्पष्ट तौर पर ज़िक्र किया गया है कि “राज्य किसी भी नागरिक से धर्म, मूल-वंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान आदि के आधार पर भेद-भाव नहीं करेगा, अनुच्छेद 19A के D में स्पष्ट लिखा गया है कि भारत के राज्यक्षेत्र में कोई भी कहीं भी घूम सकता है।उसी अनुच्छेद के अगले भाग में रोज़गार-व्यापार की स्वतंत्रता भी स्थापित की गई है।”

मेरे विचार से संविधान के तमाम अधिकारों को खारिज़ कर क्षेत्रवाद की हिंसक चाशनी में देश को डुबोने की तरकीब भारत में आंतरिक युध्द को जन्म दे सकती है। यदि हर राज्य में बाहरी पलायन करने वाले नागरिकों को भगाना ही राज्य के तरक्की की वजह हो सकती है, तब सर्वप्रथम संविधान के प्रस्तावना से ‘हम भारत के लोग’ को संशोधित कर अपने अनुसार राज्यों का ज़िक्र होना चाहिए। जब देश और संविधान की धारणा राज्य पर हावी होते क्षेत्रवादी ताकतों के आगे बौनी दिखाई पड़ रही है और देश और संविधान की धारणा ही संशयात्मक है, तब उसे भी हर स्तर पर संशोधित कर संघ-राज्य की मौलिक अधिकारों पर भी विमर्श करना चाहिए।


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