सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : अब पति पत्नी का ' मालिक ' नहीं


सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : अब पति पत्नी का ' मालिक ' नहीं

पति, पत्नी और 'वो' का रिश्ता अब अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अडल्टरी यानी विवाहेतर संबंध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। अडल्टरी तलाक का आधार रहेगा और इसके चलते खुदकुशी के मामले में उकसाने का केस भी दर्ज हो सकेगा। महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : 'अब पति महिला का ' मालिक ' नहीं

पति, पत्नी और 'वो' का रिश्ता अब अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अडल्टरी यानी विवाहेतर संबंध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। कोर्ट ने IPC की धारा 497 में अडल्टरी को अपराध बताने वाले प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया। गुरुवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस आरएफ नरीमन की पांच जजों की बेंच ने एकमत से यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने हालांकि कहा कि अडल्टरी तलाक का आधार रहेगा और इसके चलते खुदकुशी के मामले में उकसाने का केस भी दर्ज हो सकेगा। यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने महिलाओं की इच्छा, अधिकार और सम्मान को सर्वोच्च बताया और कहा कि पति महिला का मालिक नहीं होता है। उन्हें सेक्शुअल चॉइस से रोका नहीं जा सकता है। 

"अडल्टरी कानून मनमाना है। यह महिला की सेक्सुअल चॉइस को रोकता है और इसलिए असंवैधानिक है। महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है।" -जस्टिस चंद्रचूड़ 

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अपने और जस्टिस खानविलकर की ओर से फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘हम विवाह के खिलाफ अपराध से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 को असंवैधानिक घोषित करते हैं।’ अलग से अपना फैसला पढ़ते हुए न्यायमूर्ति नरीमन ने धारा 497 को पुरातनपंथी कानून बताते हुए जस्टिस मिश्रा और जस्टिस खानविलकर के फैसले के साथ सहमति जताई। उन्होंने कहा कि धारा 497 समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करती है।
 
भारतीय सरिउस अधिनियम 1887 5. कोई भी शादीशुदा व्यक्ति किसी अविवाहित लड़की या विधवा महिला से उसकी सहमती से शारीरिक संबंध है तो यह अपराध की श्रेणी में नही आता है। भारतीय दंड संहिता व्यभिचार, धारा 498 6. यदि दो वयस्क लड़का या लड़की अपनी मर्जी से लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं तो यह गैर कानूनी नही है। और तो और इन दोनों से पैदा होने वाली संतान भी गैर कानूनी नही है और संतान को अपने पिता की संपत्ति में हक़ भी मिलेगा।

महिला का  मालिक नहीं होता है पति , फैसले की 10 बातें

एडल्टरी लॉ को रद्द कर देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ता के वकील राज कल्लिशवरम ने कहा कि सीपीसी 192 और 497 खत्म हो गया. व्यभिचार के आधार पर अब कोई भी व्यक्ति अब इस मामले में अपराधी करार नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा कि यह कानून महिलाओं के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव पूर्ण है. कोर्ट ने कहा है कि यह काफी पुराना और उपनिवेश काल का है और यह अभी के समय और संविधान के स्तर पर उपयुक्त नहीं है. 

उन्होंने यह भी कहा कि "यह ऐतिहासिक फैसला है... मैं इस फैसले से बेहद खुश हूं... भारत की जनता को भी इससे खुश होना चाहिए..."
  1. 157 साल पुराने व्यभिचार कानून को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया
  2. सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी पुरुष द्वारा विवाहित महिला से यौन संबंध बनाना अपराध नहीं 
  3. सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार कानून को बताया असंवैधानिक , कहा-चीन, जापान, ब्राजील में ये अपराध नहीं
  4. चीफ जस्टिस ने कहा-व्यभिचार  कानून महिला के जीने के अधिकार पर असर डालता है.
  5. चीफ जस्टिस ने कहा-इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यभिचार तलाक का आधार हो सकता है, मगर यह अपराध नहीं हो सकता
  6. CJI बोले- भारतीय संविधान की खूबसूरती ये है कि ये I, me and U को शामिल करता है
  7. प्रधान न्यायाधीश  दीपक मिश्रा ने 157 साल पुराने व्यभिचार कानून को बताया मनमना
  8. सुप्रीम कोर्ट ने कहा-जो भी सिस्टम महिला की गरिमा से विपरीत या भेदभाव करता है वो संविधान के wrath को आमंत्रित करता है. जो प्रावधान महिला के साथ गैरसमानता का बर्ताव करता है वो अंसवैंधानिक है
  9. पांच में से दो जज  व्यभिचार कानून को रद्द करने को लेकर हुए एकमत. बहुमत से दिया फैसला
  10. सुप्रीम कोर्ट ने कहा-यह पूर्णता निजता का मामला है, महिला को समाज की चाहत के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.

Extra मैरिटल अफेयर पर दुनियाभर में बने हैं ऐसे कानून

सुप्रीम कोर्ट ने आज विवाहेतर संबंध को लेकर बड़ा फैसला दिया है। अडल्टरी कानून के सेक्शन 497 को असंवैधानिक करार देते हुए इसे अपराध के दायरे से बाहर करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का उदाहरण दिया और कहा कि इन देशों में ऐसा कानून नहीं है। इससे पहले 2 अगस्‍त को सुनवाई के दौरान विवाहेतर संबंध को अपराध मानने वाले आईपीसी के सेक्शन 497 को मनमाना और महिला विरोधी बताया था। इस मौके पर आइये जानते हैं दुनिया के अन्य देशों में विवाहेतर संबंध को लेकर क्या कानून हैं...

क्‍या है IPC 497?

आईपीसी के सेक्‍शन 497 के तहत अगर शादीशुदा पुरुष किसी अन्‍य शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाता है तो यह अपराध है. लेकिन इसमें शादीशुदा महिला के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है. इस सेक्‍शन में सबसे जरूरी बात ये है विवाहित महिला का पति भी अपनी पत्‍नी के खिलाफ केस दर्ज नहीं करा सकता है. इस मामले में शिकायतकर्ता विवाहित महिला से संबंध बनाने वाले पुरुष की पत्‍नी ही शिकायत दर्ज करा सकती है. व्यभिचार कानून को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द, संविधान पीठ ने कहा- यह अपराध नहीं 

इस कानून के तहत अगर आरोपी पुरुष पर आरोप साबित होते है तो उसे अधिकत्‍तम पांच साल की सजा हो सकती है. इस मामले की शिकायत किसी पुलिस स्‍टेशन में नहीं की जाती है बल्कि इसकी शिकायत मजिस्‍ट्रेट से की जाती है और कोर्ट को सबूत पेश किए जाते हैं.

केन्‍द्र सरकार ने दी थी ये दलीलें 

- केंद्र सरकार ने IPC की धारा 497 का समर्थन किया था. केंद्र सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी ये कह चुका कि जारता विवाह संस्थान के लिए खतरा है और परिवारों पर भी इसका असर पड़ता है. 
- केंद्र सरकार की तरफ ASG पिंकी आंनद ने कहा था अपने समाज में हो रहे विकास और बदलाव को लेकर कानून को देखना चाहिए न कि पश्चिमी समाज के नजरिये से. 

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर कानून

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर इन दिनों बहुत आम बात हो गई है और इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में इसी मुद्दे पर बहस चल रही है। भारत में अडल्टरी कानून के तहत सिर्फ़ पुरुषों को ही सजा का प्रावधान है, साथ ही इसमें कुछ ऐसी बातें भी है जो पत्नी को पति की संपत्ति के बताती है। भारत के अलावा एशिया के सिर्फ तीन देश दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और ताइवान में विवाहेतर संबंध को अपराध की श्रेणी में रखा गया था।

दुनियाभर के अडल्टरी कानून : 

  • एशियाई देश: जापान ने 1947 में इसे अपराध मानने से इनकार कर दिया। फिलीपींस में एक्स्ट्रा मैरिटल अफयेर के मामले में 4 महीने से लेकर 6 साल तक की सजा का प्रावधान है। 
  • ​मुस्लिम देश: मुस्लिम देश एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को लेकर ज़्यादा सख्त हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और सोमालिया समेत कई मुस्लिम देशों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को न सिर्फ अपराध माना जाता है। 
  • सऊदी अरब में जहां पत्थर मार-मारकर जान से मारने की सजा का प्रावधान हैं। गंभीर अपराध के लिए पत्थर मार-मारकर मारने या 100 कोड़े सार्वजनिक रूप से मारने का प्रावधान है। 
  • मिस्र में महिलाओं को 2 साल तक जेल की सजा और पुरुष को छह महीने तक जेल की सजा होती है। ईरान इस मामले में काफी सख्त है वहां तो सीधे फांसी दे दी जाती है। 
  • भारत: आईपीसी के सेक्शन 497 के मुताबिक अगर कोई विवाहित पुरुष किसी शादीशुदा महिला से उसके पति के मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अपराध करता है और इसके लिए सजा का प्रावधान है।
  • पाकिस्तान: पाकिस्तान में ऐसे मामलों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है। गंभीर अपराध के लिए पत्थर मार-मारकर मारने या 100 कोड़े सार्वजनिक रूप से मारने का प्रावधान है।
  • सोमालिया: पत्थर मार-मारकर मारने की सजा
  • फिलीपींस: 4 महीने से लेकर 6 साल तक की सजा का प्रावधान
  • अफगानिस्तान: सार्वजनिक रूप से 100 कोड़े मारने का प्रावधान
  • ईरान: फांसी की सजा
  • तुर्की: 1996 में इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया
  • अमेरिका के 21 राज्यों में विवाहेतर संबंध अवैध है। न्यूयॉर्क समेत कई राज्यों में पति या पत्नी को धोखा देने को मामूली जुर्म माना जाता है। इदाहो, मैसाचूसट्स, मिशिगन, ओकलाहोमा और विसोकोंसिन जैसे राज्यों में यह घोर अपराध है जिसकी सजा के तौर पर जुर्माना लिया जा सकता है या फिर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
  • ताइवान में विवाहेतर संबंध अपराध माना जाता है और वहां इसके लिए एक साल जेल की सजा का प्रावधान है। यहां का कानून महिलाओं को लेकर भेदभाव करता है। अगर ताइवानी पुरुष पकड़ा जाता है तो वह माफी मांगकर छूट जाता है जबकि महिला के मामले में उसे कोर्ट में घसीटा जाता है। 
शाइना जोसफ ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल करके आईपीसी की धारा 497 को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए इसकी वैधता को चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया है कि यह कानून केवल पुरुषों को सजा देता जबकि सहमति से बनाए गए इस संबंध के अपराध में महिलाएं भी बराबर की भागीदार होती हैं। अब तक हमारे देश में इस अपराध में दोषी पाए जाने पर पुरुष को पांच साल तक की सजा हो सकती थी, जबकि महिला पर उकसाने तक का मामला दर्ज नहीं हो सकता। मगर आज सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 के अंतर्गत इस कानून को असंवैधानिक करार दे दिया है।

जानिए क्या है अडल्ट्री कानून?

आज सुप्रीम कोर्ट विवाहेत्तर संबंधों पर भी फैसला सुनाएगी। विवाहेत्तर संबंधों को लेकर 1860 में बना यह अडल्ट्री कानून (व्याभिचार कानून) करीब 150 साल पुराना है। इसक जिक्र आईपीसी की धारा 497 में किया गया है। इस कानून के मुताबिक अगर कोई मर्द किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, तो पति की शिकायत पर इस मामले में पुरुष को अडल्ट्री कानून के तहत दोषी माना जाता है। ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल की कैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सजा का प्रवाधान है।
हालांकि इस कानून का एक प्रावधान यह भी है कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी कुंवारी या विधवा महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अडल्ट्री के तहत दोषी नहीं माना जाएगा।

विवाद क्यों 

पुरुष वर्ग की ओर से इस कानून पर आपत्ति दर्ज करवाई जाती रही है। सवाल उठता रहा है कि जब दो वयस्कों की सहमति से कोई विवाहेतर संबंध बनाए जाते हैं तो इसकी सजा सिर्फ एक पक्ष को क्यों दी जाए? आज शीर्ष कोर्ट इस बात का फैसला करेगी कि आईपीसी की धारा 497 के तहत अडल्ट्री कानून के तहत पुरुष और महिला दोनों को बराबर सजा मिलनी चाहिए या नहीं।

सरकार का पक्ष
इटली में रहने वाले एनआरआई जोसेफ शाइन ने दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने अपील की थी कि पुरुष और महिला दोनों को ही बराबर सजा मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने यह कहते हुए कानून का समर्थन किया है कि विवाह संस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह कानून आवश्यक है। अडल्ट्री से जुड़े कानून को हल्का करने या उसमें बदलाव करने से देश में शादी जैसी संस्था खतरे में पड़ सकती है।

अडल्टरी रहेगा तलाक का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अडल्टरी अपराध तो नहीं होगा, लेकिन अगर पति और पत्नी में से कोई अपने पार्टनर के व्यभिचार के कारण खुदकुशी करता है, तो सबूत पेश करने के बाद इसमें खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला चल सकता है। इसके साथ ही तलाक के लिए विवाहेतर संबंधों को आधार माना जाएगा। 

महिलाओं के अधिकार की बात

देश की सर्वोच्च अदालत ने फैसला देते वक्त महिला अधिकारों की बात भी की। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि अब यह कहने का समय आ गया है कि पति महिला का मालिक नहीं होता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि अडल्टरी कानून मनमाना है। उन्होंने कहा कि यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। अडल्टरी कानून महिला की सेक्सुअल चॉइस को रोकता है और इसलिए यह असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने इसके साथ ही दूसरे देशों की मिसाल देते हुए कहा कि चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में व्यभिचार अपराध नहीं है। 

केंद्र की दलील 

इससे पहले 8 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि अडल्टरी अपराध है और इससे परिवार और विवाह तबाह होता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली संवैधानिक बेंच ने सुनवाई के बाद कहा था कि मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा। 

आईपीसी की धारा-497 के तहत सिर्फ पुरुषों को माना जाता है अपराधी 

गौरतलब है कि आईपीसी की धारा-497 के प्रावधान के तहत पुरुषों को अपराधी माना जाता है, जबकि महिला विक्टिम मानी गई है। धारा ये भी कहती है कि पति की इजाज़त से गैर मर्द से संबंध बनाए जा सकते हैं। इसे एक तरह से पत्नी को पति की संपत्ति करार देने जैसा माना जाता था। पति की मर्जी के बगैर पत्नी गैर मर्द से संबंध बनाती है तो पति उस गैर मर्द पर केस दर्ज करा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता का कहना था कि महिलाओं को अलग तरीके से नहीं देखा जा सकता क्योंकि आईपीसी की किसी भी धारा में जेंडर विषमताएं नहीं हैं। याचिका में कहा गया था कि आईपीसी की धारा-497 के तहत जो कानूनी प्रावधान हैं वह पुरुषों के साथ भेदभाव वाला है। आईपीसी के सेक्शन 497 के मुताबिक अगर कोई विवाहित पुरुष किसी शादीशुदा महिला से उसके पति की मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाता है तो अब यह अपराध नहीं माना जाएगा।

सहमति से संबंध पर यह थी मांग 

याचिका में कहा गया था कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाता है तो ऐसे संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ उक्त महिला का पति अडल्टरी का केस दर्ज करा सकता है लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं है जो भेदभाव वाला है और इस प्रावधान को गैर-संवैधानिक घोषित किया जाए।

व्यभिचार के मामलों में महिला के खिलाफ भी हो सकती कानूनी कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

व्यभिचार के मामलों में क्या महिला के खिलाफ भी हो सकती कानूनी कार्रवाई? सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने IPC के सेक्शन 497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा जब संविधान महिला और पुरुष दोनों को बराबर मानता है तो आपराधिक केसों में ये अलग क्यों? कोर्ट ने कहा कि जीवन के हर तौर तरीकों में महिलाओं को समान माना गया है तो इस मामले में अलग से क्यों बर्ताव हो. जब अपराध को महिला और पुरुष दोनों की सहमति के किया गया हो तो महिला को सरंक्षण क्यों दिया गया.

IPC का सेक्शन 497 एक विवाहित महिला को सरंक्षण देता है भले ही उसके दूसरे पुरुष से संबंध हों. ये सेक्शन महिला को पीड़ित ही मानता है भले ही अपराध को महिला और पुरुष दोनों ने किया हो. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इस प्रावधान की वैधता पर सुनवाई करेगा.  कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में महिला के साथ अलग से बर्ताव नहीं किया जा सकता जब दूसरे अपराध में लैंगिक भेदभाव नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति महिला के साथ वस्तु की तरह बर्ताव नहीं कर सकता और महिला को कानूनी कार्रवाई से सरंक्षण मिलना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि ये पुराना प्रावधान लगता है जब समाज में प्रगति होती है तो पीढ़ियों की सोच बदलती है. कोर्ट ने कहा कि इस बारे में नोटिस जारी किया जाता है और आपराधिक केसों में सामान्य तटस्थता दिखानी चाहिए. दरअसल केरल के एक्टीविस्ट जोसफ साइन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर IPC 497 की वैधता को चुनौती दी है. उनका कहना है कि पहले के तीन फैसलों में इसे बरकरार रखा गया और संसद को कानून में संशोधन करने की छूट दी गई.

अपराध पत्नी के खिलाफ, शिकायत का हक पति को

एडल्टरी के लिए धारा-497 में प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत अगर किसी शादीशुदा महिला के साथ कोई गैर पुरुष संबंध बनाता है, तो वह उसके खिलाफ केस किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए यह जरूरी है कि शिकायत शादीशुदा महिला के पति की तरफ से की जाए। अगर महिला की सहमति न हो, तो उससे संबंध बनाने वाले के खिलाफ रेप का केस दर्ज होगा, लेकिन महिला की सहमति हो तो रेप का केस नहीं बनेगा। ऐसे में महिला के पति की सहमति से व्यभिचार का केस किया जा सकता है। अगर महिला के पति को ऐसे संबंध से कोई आपत्ति नहीं है तो महिला से संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती। महिला की शिकायत के ऐसे में कोई मायने नहीं हैं। 

शिकायत कोर्ट में

सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिनल लॉयर डी. बी. गोस्वामी ने बताया कि एडल्टरी का केस सीधे थाने में दर्ज नहीं हो सकता। इसके लिए पीड़ित पति को संबंधित मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करनी होगी और तमाम साक्ष्य पेश करने होंगे। उसकी शिकायत से संतुष्ट होने के बाद अदालत आरोपी को समन जारी कर सकती है और फिर मुकदमा चलाया जा सकता है। ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम पांच साल कैद हो सकती है। ये मामला समझौतावादी और जमानती होता है। 

महिला को शिकायत का अधिकार नहीं

एडल्टरी मामले में उस पुरुष को शिकायत करने का अधिकार है, जिसकी पत्नी किसी और से संबंध बनाती है लेकिन उस महिला को शिकायत का कोई अधिकार नहीं है, जिसके पति ने किसी और से संबंध बनाए।

समानता का सवाल

गोस्वामी ने बताया कि इस कानून में एडल्टरी का केस सिर्फ उस शख्स के खिलाफ दर्ज हो सकता है, जिसने शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाए। उस महिला के खिलाफ केस दर्ज नहीं होता, जिसने ऐसे संबंध बनाने के लिए सहमति दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कुछ साल पहले एक अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि यह संविधान के अनुच्छेद-14 की भावना के खिलाफ है। अगर किसी काम के लिए आदमी के खिलाफ केस दर्ज हो सकता है, तो फिर महिला के खिलाफ क्यों नहीं? इस अर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने महिला को कमजोर पक्ष माना और कहा कि ऐसे में उनके खिलाफ केस नहीं चलाया जा सकता। 

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