गांव की दुर्दशा


गांव की दुर्दशा

जिस गांव के चारों तरफ जंगल थे, हरियाली थी, किसी का कुछ पता नहीं। बढ़ती आबादी ने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति का अधिकांश रूप से दुरुपयोग व दोहन किया, फलस्वरूप 75 प्रतिशत गांवों के आसपास के जंगल नष्ट हो गए। 

गांव की दुर्दशा

मेरा भारत गांवों में बसता था। आज तो गांव ही गायब हो गया। गांधीजी बरसों पहले जिस गांव को हरा-भरा पर्यावरण से भरपूर, सर्वधर्म समभाव, भाईचारा, प्रेम, अध्यात्म, विज्ञान, सदाचार, अनुशासन आदि-इत्यादि गुणों से युक्त कर गए थे गांधीजी का स्वच्छ निर्मल गांव आज पता नहीं कहां खो गया है।

जंगल नष्ट-बढ़ता प्रदूषण

जिस गांव के चारों तरफ जंगल थे, हरियाली थी, किसी का कुछ पता नहीं। विदेशी पेड़-पौधे शोपीस बने थे, जो खुद ही छाया के लिए तरस रहे थे। जगह-जगह सीमेंट-कांक्रीट की इमारतें। गुणात्मक विधि से बढ़ती आबादी ने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति का अधिकांश रूप से दुरुपयोग व दोहन किया, फलस्वरूप आज तक की स्थिति में लगभग 75 प्रतिशत गांवों के आसपास के जंगल नष्ट हो गए। शहरी विकास की छाया ने गांवों में भी पसरना शुरू किया, फलस्वरूप जहां फलदार-छायादार पेड़-पौधे थे वहां सीमेंट-कांक्रीट फैल गया। रही-सही कसर अपशिष्ट पदार्थों आदि ने पूरी कर दी। रासायनिक और अन्य तरह का कचरा शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी आतंक मचाने लगा।

विकास/मतभेद-मनभेद में बढ़ोतरी

गांवों की सभ्यता, संस्कृति, प्राकृतिक वातावरण यानी निच्छलता, नि:स्वार्थ, भाईचारा, प्रेम व सद्भाव शनै:-शनै: शहरी संस्कृति से रूबरू होने पर धराशायी होने लगे और स्वार्थता ने अपनी पैठ शुरू कर दी। विशुद्ध ग्रामीण भारतीय को हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई बना दिया गया। हां, ये जरूर है कि गांव वालों को शिक्षा का अवसर दिया गया, उनके स्वास्थ्य की चिंता रखी गई और भी कई विकास कार्यक्रम भी हुए। जिन गांवों में बिजली सपना थी, वहां बिजली पहुंची।

मगर भौतिक विकास के विरुद्ध आत्मिक विकास में शहर की प्रदूषित संस्कृति ने भी डेरा डाल लिया। इसी वजह से आज गांव में भी खरामा-खरामा ये देखा जा सकता है कि जिस घर में भोजन कराए बिना जाने नहीं देते थे, आज उस घर के मेजबान कहते हैं कि 'पानी से काम चल जाएगा?' विकास हुआ है, मगर लोगों के दिलों का विकास ह्रास गति में चला गया यानी अब गांव भी शहर के साथ कंधा मिला रहे हैं। गांव भी अब बिगड़ते जा रहे हैं।

ऐसा होना स्वाभाविक है। दरअसल आज गांव अप्रासंगिक हो चुके हैं। खेती का मौलिक ढांचा बदल गया है। पूर्व में खेती बैल अथवा ऊंट से की जाती थी। बैल के लिए संभव होता है कि एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित खेत को सबेरे जाये और शाम तक जुताई करके घर वापस आ जाये। खेत की दूरी ज्यादा हो तो बैल जाने-आने में ही थक जाता है। इसीलिए पहले गांवों को लगभग दो किलोमीटर की दूरी के अन्दर ही बसाया जाता था। ट्रैक्टर की खोज ने परिस्थिति में मूल परिवर्तन लाया है। अब 15 किलोमीटर दूर स्थित खेत पर ट्राली से श्रमिक ले जाकर कटाई बोआई कराना आसान हो गया है। अत: हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान छोटे कस्बों में बसना पसन्द कर रहे हैं। इन कस्बों में बस, सडक़, स्कूल, अस्पताल, मोबाइल, टेलीविजन आदि की सुविधा गांवों की तुलना में अच्छी है जिसने जीवन आसान बना दिया है।  

कृषि में आय

कस्बे में बसने के बाद भी किसान का भला नहीं हो रहा है चूंकि किसान की आय दबाव में है। आर्थिक विकास के साथ-साथ किसान आय का ह्रास अवश्य ही होता है। स्वतंत्रता के समय देश की आय में कृषि का हिस्सा लगभग 50 प्रतिशत था। साठ वर्षों के अन्दर यह घटकर 20 प्रतिशत से भी कम हो गया है। विकसित देशों में कृषि का हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम है। आर्थिक विकास के साथ-साथ देश में कल कारखाने और साफ्टवेयर पार्क स्थापित हुए हैं। इनसे शहरों में आय तेजी से बढ़ती है। गांव की आय पूर्ववत् है। फलस्वरूप देश की आय में कृषि का हिस्सा घट गया है। जैसे कागज पर खिंची लाइन के बगल में बड़ी लाइन खींच दी जाये तो पुरानी लाइन छोटी दिखने लगती है।

मैन्यूफेक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की तर्ज पर कृषि में आय की वृद्धि नहीं हो पाती है चूंकि इनमें निवेश की सीमा है। पांच एकड़ के खेत में एक टै्रक्टर और एक ट्यूबवेल लगाने के बाद और निवेश नहीं किया जा सकता है। तुलना में किसी साफ्टवेयर पार्र्क  में आधुनिकतम कम्प्यूटरों एवं राउटरों में निवेश की असीमित संभावना है। निवेश के अभाव में कृषि में आय भी सीमित रहती है। खबर है कि जयापुर में आधुनिक लूम लगाकर एक दर्जन महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। नि:सन्देह यह रोजगार सब्सिडी पर चल रहा होगा और स्थायी नहीं रहेगा। कारण कि इन्हीं लूमों को शहर में लगाना ज्यादा लाभप्रद रहता है। शहर में बिजली 20 घंटे उपलब्ध रहती है। दिन के समय बिजली न आये तो गांव में उस दिन के उत्पादन का नुकसान हो जाता है। मशीन में किसी प्रकार की खराबी आ जाये तो शहर में पास के मिस्त्री को बुलाकर दो घंटे में दुरुस्त कराया जा सकता है। गांव में उसी काम को दो-तीन दिन लग जाते हैं। आन-जाने का किराया भी पड़ता है। ग्राहक के लिए शहर में पहुंचना आसान रहता है। बुने कपड़े को आसानी से बाजार उपलब्ध हो जाता है। इन तमाम असुविधाओं के कारण गांवों में उद्यम सफल नहीं हो पाते हैं। तमाम सर्वोदय आश्रमों द्वारा इस दिशा में किये गये प्रयास असफल हुए हैं। गांव की परिस्थिति आज जमींदारी समाप्त होने के बाद ठिकाने की हालत जैसी है। मकान, चौपाल तथा सडक़ का ढांचा खड़ा है। परन्तु आय के स्रोत सिकुड़ चुके हैं। समय क्रम में यह भी ध्वस्त हो जायेगा।

इस परिस्थिति में कृषि विकास के दूसरे आयाम खोजने होंगे। आज नीदरलैण्ड में ट्यूलिप के फूलों की भारी मात्रा में खेती हो रही है। सडक़ के किनारे लाल, गुलाबी और पीले ट्यूलिप के फूलों से लदे बड़े-बड़े खेत दिखते हैं। वहां आम श्रमिक की दिहाड़ी लगभग 7000 रुपए प्रतिदिन है। ट्यूलिप की खेती से किसान इतना कमाते हैं कि मजदूर की दिहाड़ी दे सकें। इसी तर्ज पर आज कई फार्म विशेष प्रकार के फल पैदा कर रहे हैं। जैसे तरबूज के फल को चौकोर आकार के डिब्बों में बन्द कर दिया जाता है वे बड़े होकर चौकोर आकार में तैयार होते हैं। इनका दाम अधिक मिलता है अथवा आजकल पूरे विश्व में आर्गेनिक खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है। रासायनिक फर्टिलाइजर तथा कीटनाशकों के उपयोग किये गये बिना उपजाये फल, सब्जी, अनाज और शहद के दाम ज्यादा मिलते हैं। नरेन्द्र मोदी को चाहिये कि गोद लिए गये गांवों में उन्नत कृषि के इन आयामों पर ज्यादा ध्यान दें। बस स्टैंड मात्र बना देने से काम नहीं चलेगा चूंकि किसान के पास किराया देने के लिए आय नहीं है। उन्नत कृषि को भी कस्बों से लागू करना ज्यादा आसान होगा। अत: मोदीजी को कस्बे गोद लेने पर विचार करना चाहिये।

कृषि में श्रम की जरूरत 

नई तकनीक के आविष्कार से कृषि में श्रम की जरूरत भी कम हो गई है। पहले बैल से जुताई होती थी और हाथ से बीज डाले जाते थे तथा निराई की जाती थी। ढेंकली और रहट से पानी डाला जाता था। खेत मजदूर फसल की कटाई करते थे। बैल से दंवाई की जाती थी। आज ये सब कार्य मशीनों से किये जाने लगे हैं। 10 एकड़ की जमीन में पूर्व में यदि 10 श्रमिक लगते थे तो आज केवल दो श्रमिक की जरूरत रह गई है। शेष 8 मजदूर आज शहर की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। प्रलोभन देकर इन्हें गांव में उलझाये रखना इनके प्रति अन्याय होगा। मोदी को चाहिये कि जयापुर गांव के युवाओं के पलायन को सुलभ बनायें। आज आईटीआई डिग्री धारक बेरोजगार हैं। उन्हें आईटीआई में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग नहीं दी जा रही है। टीचर ठेके पर रखे गये हैं। इन्हें स्वयं प्रैक्टिकल ज्ञान नहीं है। स्थायी अध्यापकों की पढ़ाने में रुचि नहीं है। वे कुर्सी पर बैठे अपनी तनख्वाह उठाकर मस्त हैं। मोदीजी को चाहिये कि जयापुर के युवाओं को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देने की व्यवस्था करें जो उनके पलायन में सहायक हो। फल पक जाता है तो उसे पेड़ से तोडऩा ही अच्छा माना जाता है। इसी प्रकार गांव के युवा पक चुके हैं। इन्हें अन्यत्र भेज देना ही इनके भविष्य को उज्ज्वल करने का रास्ता है। हमारे गांवों के  आदर्श बनने में पेंच इस बात का है कि इनकी आधारभूत आर्थिकी को ट्रैक्टर और ट्यूबवेल ने श्रमविहीन बना दिया है। अत: मोदी को आदर्श गांव के स्थान पर आदर्श कस्बों को सृजित करने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये।
किसान जाए तो जाए कहां?

चौधरी चरण सिंह किसानों के सर्वमान्य नेता थे। उन्होंने भूमि सुधारों पर काफी काम किया था। उनका मानना था कि खेती के केंद्र में है किसान, इसलिए उसके साथ कृतज्ञता से पेश आना चाहिए और उसके श्रम का प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए। पर आज जब किसानों को खुद अपनी ही फसल का मुनाफा नहीं मिलता, अपनी ही मेहनत की दिहाड़ी नहीं पड़ती, तो किसान जाए कहां? जब उसकी चुनी हुईं सरकारें ही उस पर ज्यादतियां करने लगे, तमाम योजनाओं के बाद वो मन्नतें करे और घर-परिवार के भरण-पोषण के बोझ में दोहरा हो जाए तो निश्चित है, वो ऐसी जिंदगी जीना पसंद ही नहीं करेगा।

किसान किसके भरोसे

यही कारण है कि दिन-प्रतिदिन, साल-दर-साल किसानों की आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं। नहीं तो जीना कौन नहीं चाहता? चिता पर रखे 100 साल के बुजुर्ग मुर्दे के जिस्म में यदि प्राण आ जाए और कोई इस पर ध्यान न दे तो वह खुद उठकर दूर खड़ा हो जाएगा, क्योंकि उसमें जीने की इच्छाएं शेष होती हैं जबकि वह तो संभवत: सब कुछ देख चुका होता है। फिर ये किसान क्यों अपनी आधी जिंदगी और छोटे-छोटे बच्चे छोड़कर आत्महत्याएं कर लेते हैं? इसे कोई कुछ समझे, पर यह कोई शौक नहीं बल्कि परेशानी है, जो तब कटना संभव नहीं रहती तो प्राय: यही एक कदम सूझता है। हालांकि इसमें कोई दो मत नहीं कि आत्महत्या पाप है। आज किसानों की जो स्थिति बनी है, वह बेहद दयनीय और चिंतनीय है। किसान आत्महत्या करने को विवश हैं।

गत वर्ष आई एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों की आत्महत्या का कारण कर्ज, कंगाली और खेती से जुड़ी हुईं दिक्कतें हैं। इसके लिए सरकारी व्यवस्थाएं या लालफीताशाही तो जिम्मेदार है ही, साथ ही कई पारिवारिक फसाद भी किसानों की जान लेने का काम कर रहे हैं। ये फसाद घरेलू होने के चलते सार्वजनिक नहीं हो पाते, साथ ही अधिकांश की कोई शिकायत भी नहीं होती जिससे ये वास्तविकता सामने नहीं आती कि मूल वजह क्या है?

पर जो भी कारण हो, हकीकत तो सिर्फ यह है कि किसान वाकई में परेशान है। कई मामले तो ऐसे होते हैं जिनमें पुरखों की जायदाद का बंटवारा हो जाने के बाद संपन्न भाई-बंध ही अपने बेबस और असहाय किसान भाई, जिसे खुद पिता ने थोड़ी अधिक जमीन दी होती है, को इतना प्रताड़ित कर देते हैं कि वह स्वयं अपना सबकुछ इन्हीं स्वार्थियों को समर्पित कर दे। इतने पर भी यदि मन नहीं भरता तो कोर्ट-कचहरी का डर दिखा-दिखाकर उसे मरने पर विवश कर देते हैं।

तो आज किसान किसके भरोसे रहे? एक किसान होने के नाते इतना जरूर कहूंगा कि जो किसान की मांग होती है, वह भी बेहद कम और मामूली-सी होती है। सत्ता को चाहिए कि वह किसान के साथ खड़ी रहे। अपने लिए खुद किसान कुछ विशेष की मांग नहीं करता। पर हां, उसके साथ लालफीताशाही न बरती जाए। पारिवारिक फसाद यदि कचहरी आते हैं तो उन पर भी त्वरित फैसला हो।
किसान वाकई में बहुत परेशान है। उसके साथ मजाक करने की जगह उसके घावों को कोई तो सहलाकर 'किसान जयंती' को सार्थक करें।
'जय किसान-जय जवान'


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