शताब्दी का सबसे बड़ा घोटाला : राफेल विमान सौदा


शताब्दी का सबसे बड़ा घोटाला : राफेल विमान सौदा

8 अप्रैल को विदेश सचिव ने एक बयान जारी किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि फ्रांस दौरे पर प्रधानमंत्री राफेल सौदे पर बात नहीं करेंगे. और उस समय के रक्षा मंत्री ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता हो चुका है. इसके बाद 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री फ्रांस जाते हैं. इससे पहले किसी को नहीं पता कि वहां क्या होगा, 28 मार्च को देश में कम्पनी पंजीकृत होती है.

शताब्दी का सबसे बड़ा घोटाला : राफेल विमान सौदा

राफेल विमान सौदे को लेकर केंद्र सरकार चारों तरफ से घिरती दिख रही है. विमान खरीदनें में कीमत और शर्तों में किए गए बदलाव को लेकर रविवार को कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर एक बार फिर हमला बोला है. कांग्रेस के प्रवक्ता आनंद शर्मा ने एक प्रेस वार्ता में राफेल विमान सौदे को शताब्दी का सबसे बड़ा घोटाला बताया. इस दौरान उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली सरकार के बचाव की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके हर बयान से केंद्र सरकार और ज्यादा घिरती जा रही है. शर्मा ने कहा कि देश की रक्षा मंत्री अहंकार में डूबी हैं और कड़वी जवान रखती हैं. वह शहीदों और नेताओं का अपमान करती हैं. आनंद शर्मा ने रक्षा मंत्री पर झूठ बोलने का भी आरोप लगाया. संवाददाताओं से बात करते हुए आनंद शर्मा ने पीएम मोदी से भी राफेल सौदे को लेकर सवाल पूछे. उन्होंने कहा कि इस मामले में सीधा आरोप पीएम मोदी पर है. लेकिन वह इसपर कुछ नहीं बोल रहे और उनकी तरफ से दूसरे लोग लगातार सफाई देने सामने आ रहे हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतने गंभीर आरोप लगने के बाद भी देश के प्रधानमंत्री मौन क्यों हैं?.

आनंद शर्मा ने इस दौरान बीजेपी के उन आरोपों का भी जवाब दिया जिसमें इस डील के तहत रिलांयस को कांग्रेस शासन में शामिल करने की बात कही थी. उन्होंने कहा कि 2007 में RFP के लिए ग्लोबल टेंडर हुआ और 2012 में राफेल L1 चुना गया कॉन्ट्रेक्ट पर दोनों सरकारों के हस्ताक्षर हो चुके थे केवल लाइफ साईकल कॉस्ट पर बात रुकी हुई थी. 13 मार्च 2014 को HAL और दसॉल्ट के बीच वर्क शेयर अग्रीमेंट पर समझौता हो चुका था. उस दौरान टेंडर के दस्तवेज पर सब उल्लेख है कि भारत की जरूरत कैसी है? उन्होंने कहा कि 25 मार्च 2015 को  दसॉल्ट के प्रमुख ने एक बयान दिया कि हमनर कांट्रेक्ट फाइनल कर लिया है केवल दस्तखत बाकी है.  उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर यह कैसे किसी को पता लगा कि प्रधानमंत्री फ्रांस जाएंगे और डील पलट देंगे! साथ ही उन्होंने कहा कि 8 अप्रैल को विदेश सचिव ने एक बयान जारी किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि फ्रांस दौरे पर प्रधानमंत्री राफेल सौदे पर बात नहीं करेंगे. और उस समय के रक्षा मंत्री ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता हो चुका है. इसके बाद 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री फ्रांस जाते हैं. इससे पहले किसी को नहीं पता कि वहां क्या होगा, 28 मार्च को देश में कम्पनी पंजीकृत होती है.

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL)  राफेल डील से बाहर 

राफेल डील से बाहर होने पर सरकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी रक्षा कंपनी  हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड(HAL) सुर्खियों में है. कहा जा रहा है कि कुछ क्षमताओं की कमी के चलते यह कंपनी इस बड़ी डील से बाहर हो गई. अगर कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो मालुम पड़ता है कि यह वह कंपनी है, जिसने भारतीय सेना को स्वदेश में बने विमानों में उड़ान भरने के लायक बनाया. पिछले 77 साल का इतिहास देखें तो एचएएल ने एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित किए हैं. रक्षा क्षेत्र में अग्रणी माने जाने वाले अमेरिका, फ्रांस, इजरायल जैसे  दो दर्जन देशों की एयरक्राफ्ट बनाने वाली कंपनियों को भी अपना ग्राहक बनाने वाली इस सरकारी कंपनी को अब तक शानदार काम के चलते 30 से ज्यादा पुरस्कार मिल चुके हैं. देश की नवरत्न कंपनियों में शुमार हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को लीजेंड पीएसयू(सार्वजनिक उपक्रम) का भी तमगा मिल चुका है.  कंपनी ने गुणवत्ता की बदौलत 30 से अधिक देशों में निर्यात करने में सफलता हासिल की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक एचएएल  ने करीब 77 वर्षों के सफर में तीन हजार से भी अधिक विमानों का निर्माण,  3400 से अधिक विमान-इंजनों और 2600 से अधिक इंजनों की मरम्मत की है. इस वक्त आइआइटी मद्रास से एमटेक किए आर माधवन बतौर डायरेक्टर कंपनी का चार्ज संभाल रहे हैं.


सीधा आरोप 

आनंद शर्मा ने कहा कि इन सभी बातों के बीच सबसे जरूरी यह है कि इस मामले में देश के प्रधानमंत्री पर सीधा आरोप है कि उन्होंने ही अनिल अंबानी को अवगत कराया था कि वो राफेल सौदे से हल को हटाने वाले हैं. ऐसे में यह साफ है कि पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री ने पद की गोपनीयता का उल्लंघन किया और जानकारी अनिल अंबानी को जानकारी लीक की. हमें उनके कुछ सवालों के जवाब चाहिए. उन्हें बताना चाहिए कि किस आधार पर प्रधानमंत्री ने डील बदली? क्या किसी को खबर थी? किसी कमिटी से इजाजत ली गई? डील बदलने से देश में तकनीक नहीं आई. क्या प्रधानमंत्री इस षड्यंत्र में शामिल थे.  फ्रांस से लौट कर प्रधानमंत्री ने हड़बड़ी में CCS से अनुमति ली

राफेल डील (Rafale Deal) को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के खुलासे के बाद मचे घमासान के बीच फ्रांस सरकार और डसॉल्ट एविएशन का भी बयान आ गया है. एक तरीके से दोनों ने ओलांद के बयान से किनारा कर लिया है. फ्रांस सरकार ने कहा है कि इस सौदे के लिए भारतीय औद्योगिक साझेदारों को चुनने में फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी. तो दूसरी तरफ राफेल विमानों की निर्माता डसॉल्ट एविएशन ने कहा है कि डसॉल्ट ने खुद रिलायंस ग्रुप के साथ साझीदारी करने का फैसला किया था. दरअसल, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक फ़्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि रिलायंस का नाम खुद भारत सरकार ने सुझाया था. उनके इस बयान से विपक्ष के आरोपों को बल मिला और विपक्ष सरकार पर हमलावर है. आइये आपको बताते हैं राफेल डील की शुरू से अब तक की पूरी कहानी. 

राफेल डील की पूरी कहानी

  • लड़ाकू विमानों को खरीदने की पहल पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. भारत को सुरक्षा के मोर्चे पर पड़ोसी देशों से मिल रही चुनौतियों के बीच वाजपेयी सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने का प्रस्ताव रखा. हालांकि यह प्रस्ताव कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में परवान चढ़ा. 
  • तमाम विचार-विमर्श के बाद अगस्त 2007 में यूपीए सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी की अगुवाई वाली रक्षा खरीद परिषद ने 126 एयरक्राफ्ट की खरीद को मंजूरी दे दी. फिर बिडिंग यानी बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई और अंत में लड़ाकू विमानों की खरीद का आरएफपी जारी कर दिया गया.
  • लड़ाकू विमानों की रेस में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्‍ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्‍कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे, लेकिन बाजी डसाल्ट एविएशन के राफेल ने मारी. 
  • रिपोर्ट्स की मानें तो राफेल की कीमत दौड़ में शामिल अन्य सड़ाकू विमानों की तुलना में काफी कम थी और इसका रख-रखाव भी काफी सस्‍ता था. जिसकी वजह से डील राफेल के पाले में गई. उसके बाद भारतीय वायुसेना ने कई विमानों का तकनीकी परीक्षण और जांच किया. यह प्रक्रिया साल 2011 तक चलती रही. 
  • 2011 में वायुसेना ने जांच-परख के बाद कहा कि राफेल विमान उसके पैरामीटर पर खरे हैं. अगले साल यानी 2012 में राफेल को बिडर घोषित किया गया और इसके उत्पादन के लिए डसाल्ट ए‍विएशन के साथ बातचीत शुरू हुई. हालांकि तमाम तकनीकी व अन्य कारणों से यह बातचीत 2014 तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. 
  • तमाम रिपोर्ट्स के मुताबिक 2012 से 2014 के बीच बातचीत किसी नतीजे पर न पहुंचने की सबसे बड़ी वजह थी विमानों की गुणवत्ता का मामला. कहा गया कि डसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी. साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी एकमत वाली स्थिति नहीं थी.
  • मामला यहीं अटका रहा और साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद राफेल (Rafale Deal) पर फिर चर्चा शुरू हुई. 2015 में पीएम मोदी फ्रांस गए और उसी दौरान राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर समझौता किया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक समझौते के तहत भारत ने जल्द से जल्द उड़ान के लिए तैयार 36 राफेल लेने की बात की थी. 
  • नए सिरे से हुए समझौते में यह बात भी थी कि भारतीय वायु सेना को उसकी जरूरतों के मुताबिक तय समय सीमा (18 महीने) के भीतर विमान मिलेंगे. साथ ही लंबे समय तक विमानों के रख-रखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की होगी. आखिरकार सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ.
  • विपक्ष, खासकर कांग्रेस नए समझौते के बाद से ही सरकार पर हमलावर है. कांग्रेस का विरोध दो बिंदुओं पर है. पहला, कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यूपीए ने 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये में सौदा पटाया था. अब मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ रुपये रही है.
  • कांग्रेस का आरोप है कि नए समझौते के तहत एक राफेल विमान 1555 करोड़ रुपये का पड़ रहा है. जबकि कांग्रेस ने 428 करोड़ रुपये में डील तय की थी. कांग्रेस का इस डील में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को शामिल करने का भी विरोध कर रही है. पार्टी का कहना है कि सरकारी कंपनी HAL की जगह जानबूझ कर रिलायंस को डील में शामिल किया गया.
  • कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आरोप लगाते रहे हैं कि खुद पीएम मोदी ने जानबूझ कर रिलायंस को फायदा पहुंचाने के लिए डील (Rafale Deal) के साथ छेड़छाड़ की. तो दूसरी तरफ, भाजपा तमाम आरोपों को नकारती रही है. 
  • इस दौरान यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी भी राफेल डील मामले में सरकार के विरोध में उतर आए. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर दावा किया कि रिलायंस को फायदा पहुंचाने के मकसद से डील में बदलाव किया गया. उन्होंने प्रधानमंत्री पर सीधे-सीधे सवाल खड़े किए. 
  • वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने शनिवार को दावा किया कि राफेल लड़ाकू विमान सौदा ‘‘इतना बड़ा घोटाला है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते’’. उन्होंने आरोप लगाया कि ऑफसेट करार के जरिये अनिल अम्बानी के रिलायंस समूह को ‘‘दलाली (कमीशन)’’ के रूप में 21,000 करोड़ रुपये मिले. 
  •  इस बीच एडवोकेट एम एल शर्मा ने राफेल डील को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला प्रतिवादी बनाया गया है और डील को रद्द करने और FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है. याचिका पर अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को होनी है. 
  • राफेल डील (Rafale Deal) पर मचे घमासान के बीच अब फ्रांस्वा ओलांद ने नया खुलासा किया है. फ़्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस का नाम खुद भारत सरकार ने सुझाया था. हालांकि फ्रांस सरकार और डसाल्ट ने इससे किनारा किया है, लेकिन विपक्ष के आरोपों को बल मिल गया है. 


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