श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के अनमोल विचार


श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के अनमोल विचार

मैं अटल हूं.....मैं बिहारी भी हूं। पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी; ऊंचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी, नीचा दिखाई देता है। न आदमी ऊंचा होता है, न नीचा होता है; न बड़ा होता है, ना छोटा होता है। आदमी सिर्फ आदमी होता है।
हिन्दी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता व भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले महापुरुषों में से एक और भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी इन्होने देश की सेवा के लिए  अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया.  भारत ही नहीं विदेशो में भी भारत की सशक्त छवि बनायीं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के पहले प्रधानमन्त्री और रिकॉर्ड 9 बार लोकसभा के लिए चुने गये अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर, ब्रिटिश भारत में हुआ। इनके पिता का नाम पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी था जो मध्य प्रदेश की रियासत ग्वालियर में अध्यापक थे और हिन्दी और ब्रज भाषा के कवि भी थे। इनकी माता का नाम कृष्णा वाजपेयी था। 

अटल बिहारी वाजपेयी पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमन्त्री थे जिन्होंने प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल 5 वर्ष तक बिना किसी समस्या के पूरा किया। भारतीय जनसंघ की स्थापना में इनकी प्रमुख भूमिका थी। अपनी छोटी उम्र में ही वाजपेयी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहे। इन्होने वीर अर्जुन, राष्ट्रधर्म और दैनिक स्वदेश आदि पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी किया। भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा. 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में 5 भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया.

सम्प्रति वे राजनीति से संन्यास ले चुके थे और नई दिल्ली में ६-ए कृष्णामेनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहते थे। 16 अगस्त 2018 को एक लम्बी बीमारी के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली में श्री वाजपेयी का निधन हो गया। वे जीवन भर भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार विद्यार्थियों और बच्चों के लिए

  • आज वैश्विक निर्भरता का अर्थ यह है कि विकासशील देशों में आई आर्थिक आपदाएं विकसित देशों में संकट ला सकती हैं।
  • शीत युद्ध के बाद आये उत्साह में एक गलत धारणा बन गयी की संयुक्त राष्ट्र कहीं भी कोई भी समस्या हल कर सकता है।
  • किसी भी मुल्क को आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक साझदारी का हिस्सा होने का ढोंग नहीं करना चाहिए, जबकि वो आतंकवाद को बढाने, उकसाने और प्रायोजित करने में लगा हुआ हो।
  • हमारे परमाणु हथियार विशुद्ध रूप से किसी विरोधी के परमाणु हमले को हतोत्साहित करने के लिए हैं।
  • जो लोग हमसे पूछते हैं कि हम कब पाकिस्तान से वार्ता करेंगे वो शायद ये नहीं जानते कि पिछले 55 सालों में पाकिस्तान से बातचीत करने के सभी प्रयत्न भारत की तरफ से ही आये हैं।
  • गरीबी बहुआयामी है। यह हमारी कमाई के अलावा स्वास्थय, रा जनीतिक भागीदारी और हमारी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति पर भी असर डालती है।
  • जैव–विविधता कन्वेंशन ने विश्व के गरीबों को कोई ठोस लाभ नहीं पहुँचाया है।
  • भारत में भारी जन भावना थी कि पाकिस्तान के साथ तब तक कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि वो आतंकवाद का प्रयोग अपनी विदेशी नीति के एक साधन के रूप में करना नहीं छोड़ देता।
  • वास्तविकता ये है कि UN जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन उतने ही कारगर हो सकते हैं जितना की उनके सदस्य उन्हें होने की अनुमति दें।
  • संयुक्त राष्ट्र की अद्वितीय वैधता इस सार्वभौमिक धारणा में निहित है कि वह किसी विशेष देश या देशों के समूह के हितों की तुलना में एक बड़े उद्देश्य के लिए काम करता है।
  • पहले एक अन्तर्निहित दृढ विश्वास था कि संयुक्त राष्ट्र अपने घटक राज्यों की कुल शक्ति की तुलना में अधिक शक्तिशाली होगा।
  • हम मानते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका और बाकी अंतर्राष्ट्रीय समुदाये पाकिस्तान पर भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को हमेशा के लिए ख़तम करने का दबाव बना सकते हैं।
  • हम उम्मीद करते हैं की विश्व प्रबुद्ध स्वार्थ की भावना से काम करेगा।

Atal Bihari Vajpayeeji के अनमोल विचार

  1. सूर्य एक सत्य है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। मगर ओस भी तो एक सच्चाई है, यह बात अलग है कि  क्षणिक है।
  2. जलना होगा, गलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।
  3. पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी; ऊंचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी, नीचा दिखाई देता है। न
  4. आदमी ऊंचा होता है, न नीचा होता है; न बड़ा होता है, ना छोटा होता है। आदमी सिर्फ आदमी होता है।
  5. हराम में भी राम होता है।
  6. किसी संत कवि ने कहा है कि मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता; मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर उसका मन होता है।
  7. मैं अटल हूं.....मैं बिहारी भी हूं।
  8. छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।
  9. पड़ोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती, हमने कहा की चुटकी तो बज सकती है।
  10. मन हारकर मैदान नहीं जीते जाते; न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।
  11. आपका मित्र बदल सकता है लेकिन पड़ोसी नहीं।
  12. आदमी को चाहिए कि वह  परिस्थितियों से लड़े; एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।
  13. मनुष्य का जीवन अनमोल निधि है। पुण्य का प्रसाद है। हम केवल अपने लिए न जिएं, औरों के लिए भी जिए ।जीवन जीना एक कला है। एक विज्ञान है दोनों का समन्वय आवश्यक है।
  14. आदमी की पहचान उसके धन या आसन से नहीं होती; उसके मन से होती है। मन की फकीरी पर कुबेर की संपदा भी रोती है।
  15. कपड़ों की दूधिया सफेदी जैसे मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।
  16. जो जितना ऊंचा होता है; उतना ही एकाकी होता है। हर बार को स्वयं ही ढोता है, चेहरे पर मुस्कान चिपका; मन ही मन में रोता है।
  17. ऐसी खुशियां जो हमेशा हमारा साथ दें। कभी नहीं थी, कभी नहीं है और कभी नहीं रहेंगी।
  18. पृथ्वी पर मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो भीड़ में अकेला और अकेले में भीड़ से घिरे होने का अनुभव करता है।
  19. टूट सकते हैं मगर झुक नहीं सकते।


अटल जी की प्रमुख रचनायें

उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं :
  1. मृत्यु या हत्या
  2. अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह)
  3. कैदी कविराय की कुण्डलियाँ
  4. संसद में तीन दशक
  5. अमर आग है

कुछ लेख: कुछ भाषण

  • सेक्युलर वाद
  • राजनीति की रपटीली राहें
  • बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरक विचार

  • आज वैश्विक निर्भरता का अर्थ यह है कि विकासशील देशों में आई आर्थिक आपदाएं विकसित देशों में संकट ला सकती हैं । 
  • किसी भी देश को खुले आम आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठबंधन के साथ साझेदारी, सहायता, उकसाना और आतंकवाद प्रायोजित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  • गरीबी बहुआयामी है । यह हमारी कमाई के अलावा स्वास्थय , राजनीतिक भागीदारी , और हमारी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति पर भी असर डालती है ।
  • जैव विविधता सम्मेलन से दुनिया के गरीबों के लिए कोई भी ठोस लाभ नहीं निकला है। 
  • जो लोग हमें यह पूछते हैं कि हम कब पाकिस्तान के साथ वार्ता करेंगे, वे शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि पिछले  वर्षों में पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए हर बार पहल भारत ने ही किया है। 
  • पहले एक दृढ विश्वास था कि संयुक्त राष्ट्र अपने घटक राज्यों की कुल शक्ति की तुलना में अधिक मजबूत होगा। 
  • भारत में भारी जन भावना थी कि पाकिस्तान के साथ तब तक कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि वो आतंकवाद का प्रयोग अपनी विदेशी नीति के एक साधन के रूप में करना नहीं छोड़ देता।
  • वैश्विक स्तर पर आज परस्पर निर्भरता का मतलब विकासशील देशों में आर्थिक आपदाओं का विकसित देशों पर प्रतिघात करना होगा।
  • संयुक्त राष्ट्र की अद्वितीय वैधता इस सार्वभौमिक धारणा में निहित है कि वह किसी विशेष देश या देशों के समूह के हितों की तुलना में एक बड़े उद्देश्य के लिए काम करता है।
  • हमें विश्वाश है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और बाकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के भारत के विरुद्ध सीमा पार आतंकवाद को स्थायी और पारदर्शी रूप से ख़त्म कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा सकते हैं। 
  • हमारे परमाणु हथियार शुद्ध रूप से किसी भी विरोधी के परमाणु हमले को ख़त्म करने के लिए हैं।
  • आप मित्र बदल सकते हैं पर पडोसी नहीं ।
  • संयुक्त राष्ट्र की अद्वितीय वैधता इस सार्वभौमिक धारणा में निहित है कि वह किसी विशेष देश या देशों के समूह के हितों की तुलना में एक बड़े उद्देश्य के लिए काम करता है । 
  • वास्तविकता ये है कि यू एन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन उतने ही कारगर हो सकते हैं जितना की उनके सदस्य उन्हें होने की अनुमति दें । 
  • भारत में भारी जन भावना थी कि पाकिस्तान के साथ तब तक कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि वो आतंकवाद का प्रयोग अपनी विदेशी नीति के एक साधन के रूप में करना नहीं छोड़ देता । 
  • अमावस के अभेद्य अंधकार का अंतःकरण पूर्णिमा की उज्ज्वलता का स्मरण कर थर्रा उठता है । निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक ऊंचा उठाकर देखें ।
  • राज्य को, व्यक्तिगत सम्पत्ति को जब चाहे तब जप्त कर लेने का अधिकार देना एक खतरनाक चीज होगी ।
  • आदिवासियों की समस्याओं पर हमें सहानुभूति के साथ विचार करना होगा ।
  • सेवा-कार्यों की उम्मीद सरकार से नहीं की जा सकती । उसके लिए समाज-सेवी संस्थाओं को ही आगे उगना पड़ेगा ।
  • संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समरत मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलम्बित सामूहिक सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके ।
  • भारत के ऋषियों-महर्षियों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है ।
  • जीवन के फूल को पूर्ण ताकत से खिलाएं ।
  • कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि देश मूल्यों के संकट में फंसा है ।
  • मारुति हनुमानजी की मां का नाम है । पवनसुत के बारे में कहा जाता है कि वे चलते नहीं है,, छलांग लगाते हैं या उड़ते हैं । तो जो गुण पुत्र के बारे में हैं, माता उनसे वंचित नहीं हो सकती । मारुति कार भी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, उससे लगता है कि हर मामले में छलांग लगाती है ।
  • इस देश में पुरुषार्थी नवजवानों की कमी नहीं है, लेकिन उनमें से कोई कार बनाने का कारखाना नहीं खोल सकता, क्योंकि किसी को प्रधानमंत्री के घर में जन्म लेने का सौभाग्य नहीं प्राप्त है ।
  • इतिहास में हुई भूल के लिए आज किसी से बदला लेने का समय नहीं है, लेकिन उस भूल को ठीक करने का सवाल है ।

भारत और राष्ट्र के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरक विचार

  • भारतीय जहां जाता है, वहां लक्ष्मी की साधना में लग जाता है । मगर इस देश में आते ही ऐसा लगता है कि उसकी प्रतिभा कुंठित हो जाती है । 
  • भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है । हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है । कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं । दिल्ली इसका दिल है । विन्ध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है । पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं । कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है । पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश हैं । चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं, मलयानिल चंवर घुलता है । यह वन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है । यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है । इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है । हम जिएंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए ।
  • कंधे-से-कंधा लगाकर, कदम-से-कदम मिलाकर हमें अपनी जीवन-यात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है । भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है । हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित है ।
  • देश को हमसे बड़ी आशाएं हैं । हम परिस्थिति की चुनौती को स्वीकार करें । आखों में एक महान भारत के सपने, हृदय में उस सपने को सत्य सृष्टि में परिणत करने के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने का संकल्प, भुजाओं में समूची भारतीय जनता को समेटकर उसे सीने से लगाए रखने का सात्त्विक बल और पैरों में युग-परिवर्तन की गति लेकर हमें चलना है ।
  • भारत एक प्राचीन राष्ट्र है । 15  अगस्त,  को किसी नए राष्ट्र का जन्म नहीं, इस प्राचीन राष्ट्र को ही स्वतंत्रता मिली ।
  • यदि भारत को बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में वर्णित करने की प्रवृत्ति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो भारत के अनेक टुकड़ों में बंट जानै का खतरा पैदा हो जाएगा ।
  • पौरुष, पराक्रम, वीरता हमारे रक्त के रंग में मिली है । यह हमारी महान परंपरा का अंग है । यह संस्कारों द्वारा हमारे जीवन में ढाली जाती है ।
  • इस देश में कभी मजहब के आधार पर, मत-भिन्नता के उगधार पर उत्पीड़न की बात नहीं उठी, न उठेगी, न उठनी चाहिए ।
  • भारत के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले सभी भारतीय एक हैं, फिर उनका मजहब, भाषा तथा प्रदेश कोई भी क्यों न हो ।
  • भारत कोई इतना छोटा देश नहीं है कि कोई उसको जेब में रख ले और वह उसका पिछलग्गू हो जाए । हम अपनी आजादी के लिए लड़े, दुनिया की आजादी के लिए लड़े ।
  • दुर्गा समाज की संघटित शक्ति की प्रतीक हैं । व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थ-साधना को एक ओर रखकर हमें राष्ट्र की आकांक्षा प्रदीप्त करनी होगी । दलगत स्वार्थों की सीमा छोड्‌कर विशाल राष्ट्र की हित-चिंता में अपना जीवन लगाना होगा । 
  • राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है ।
  • कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ यह भारत एक राष्ट्र है, अनेक राष्ट्रीयताओं का समूह नहीं ।
  • मैं चाहता हूं भारत एक महान राष्ट्र बने, शक्तिशाली बने, संसार के राष्ट्रों में प्रथम पंक्ति में आए ।
  • राजनीति की दृष्टि से हमारे बीच में कोई भी मतभेद हो, जहां तक राष्ट्रीय सुरक्षा और रचतंत्रता के संरक्षण का प्रश्न है, सारा भारत एक है और किसी भी संकट का सामना हम सब पूर्ण शक्ति के साथ करेंगे ।
  • यह संघर्ष जितने बलिदान की मांग करेगा, वे बलिदान दिए जाएंगे, जितने अनुशासन का तकाजा होगा, यह देश उतने अनुशासन का परिचय देगा ।
  • देश एक रहेगा तो किसी एक पार्टी की वजह से एक नहीं रहेगा, किसी एक व्यक्ति की वजह से एक नहीं रहेगा, किसी एक परिवार की वजह से एक नहीं रहेगा । देश एक रहेगा तो देश की जनता की देशभक्ति की वजह से रहेगा ।
  • शहीदों का रक्त अभी गीला है और चिता की राख में चिनगारियां बाकी हैं । उजड़े हुए सुहाग और जंजीरों में जकड़ी हुई जवानियां उन उग्त्याचारों की गवाह हैं। 
  • देश एक मंदिर है, हम पुजारी हैं । राष्ट्रदेव की पूजा में हमें अपने को समर्पित कर देना चाहिए ।
  • भारतीयकरण का एक ही अर्थ है भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति, चाहे उनकी भाषा कछ भी हो, वह भारत के प्रति अनन्य, अविभाज्य, अव्यभिचारी निष्ठा रखें । 
  • भारतीयकरण आधुनिकीकरण का विरोधी नहीं है । न भारतीयकरण एक बंधी-बंधाई परिकल्पना है ।
  • भारतीयकरण एक नारा नहीं है । यह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मंत्र है । भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति भारत के प्रति अनन्य, अविभाज्य, अव्यभिचारी निष्ठा रखें । भारत पहले आना चाहिए, बाकी सब कुछ बाद में । 
  • हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो ।
  • अहिंसा की भावना उसी में होती है, जिसकी उरात्मा में सत्य बैठा होता है, जो समभाव से सभी को देखता है ।

हिंदी में धर्म और हिंदू धर्म के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरक विचार

  • हिन्दू धर्म तथा संस्कृति की एक बड़ी विशेषता समय के साथ बदलने की उसकी क्षमता रही है । 
  • दरिद्र में जिन्होंने पूर्ण नारायण के दर्शन किए और उन नारायण की उपासना का उपदेश दिया, उनका अंतःकरण करुणा से भरा हुआ था ।. गरीबी, बेकारी, भुखमरी ईश्वर का विधान नहीं, मानवीय व्यवस्था की विफलता का परिणाम है ।
  • कोई भी दल हो, पूजा का कोई भी स्थान हो, उसको अपनी राजनीतिक गतिविधियां वहां नहीं चलानी चाहिए ।
  • आज कहा जा रहा है कि अगर स्कूल की किताबों में विद्यार्थियों को दीवाली, दशहरा और होली के बारे में पाठ पढ़ाया जाएगा तो हमारा मजहब खतरे में पड़ जाएगा । यह मांग की जा रही है कि इस तरह के पाठ किताबों से निकाल दिए जाएं । मैं पूछना चाहता हूं कि क्या यह मांग ठीक है? होली, दीवाली और दशहरा हमारे राष्ट्रीय त्यौहार हैं । उनसे किसी मजहब का संबंध नहीं है । 
  • देश में कुछ ऐसे पूजा के स्थान हैं, जिनको पिछले हजार-पांच सौ वर्षों में दूसरे मजहब के मानने वालों ने उनके मूल उपासकों से छीनकर अपने अधिकार में कर लिया, चाहे वह कृष्ण जन्मस्थान हो, चाहे राम जन्मस्थान हो, चाहे वह काशी विश्वनाथ का मंदिर हो । 
  • हिन्दू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है । 
  • हिन्दू धर्म ऐसा जीवन्त धर्म है, जो धार्मिक अनुभवों की वृद्धि और उसके आचरण की चेतना के साथ निरंतर विकास करता रहता है । 
  • हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ है और न अंत ही । यह एक अनंत चक्र है ।
  • मुझे अपने हिन्दूत्व पर अभिमान है, किंतु इसका उरर्थ यह नहीं है कि मैं मुस्तिम-विरोधी हूं । 
  • हमें हिन्दू कहलाने में गर्व महसूस करना चाहिए, बशर्ते कि हम भारतीय होने में भी आत्मगौरव महसूस करें
  • हिन्दू समाज इतना विशाल है, इतना विविध है कि किसी बैंक में नहीं समा सकता ।
  • हिन्दू समाज गतिशील है, हिंदू समाज में परिवर्तन हुए हैं, परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है । हिन्दू समाज जड़ समाज नहीं है । 

संस्कृति के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार

  • भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक रहा ।
  • उपासना, मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है । 
  • मजहब बदलने से न राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता । 
  • सभ्यता कलेवर है, संस्कृति उसका अन्तरंग । सभ्यता सूल होती है, संस्कृति सूक्ष्म । सभ्यता समय के साथ बदलती है, किंतु संस्कृति अधिक स्थायी होती है । 

मानव होने के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार 

  • इंसान बनो, केवल नाम से नहीं, रूप से नहीं, शक्ल से नहीं, हृदय से, बुद्धि से, सरकार से, ज्ञान से ।
  • मनुष्य जीवन अनमोल निधि है, पुण्य का प्रसाद है । हम केवल अपने लिए न जिएं, औरों के लिए भी जिएं । जीवन जीना एक कला है, एक विज्ञान है । दोनों का समन्वय आवश्यक है । 
  • मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं । मुझे अपनी कमियों का अहसास है । सद्‌भाव में अभाव दिखाई नहीं देता है । यह देश बड़ा ही अद्भुत है, बड़ा अनूठा है । किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनन्दन किया जा सकता है ।
  • मनुष्य-मनुष्य के संबंध अच्छे रहें, सांप्रदायिक सद्‌भाव रहे, मजहब का शोषण न किया जाए, जाति के आधार पर लोगों की हीन भावना को उत्तेजित न किया जाए, इसमें कोई मतभेद नहीं है । 

आध्यात्मिकता के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार 

  • नर को नारायण का रूप देने वाले भारत ने दरिद्र और लक्ष्मीवान, दोनों में एक ही परम तत्त्व का दर्शन किया है ।  
  • समता के साथ ममता, अधिकार के साथ उगत्मीयता, वैभव के साथ सादगी-नवनिर्माण के प्राचीन स्तंभ हैं ।
  • भगवान जो कुछ करता है, वह भलाई के लिए ही करता है । 
  • परमात्मा एक ही है, लेकिन उसकी प्राप्ति के अनेकानेक मार्ग हैं । 
  • जीवन को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता, उसका ‘पूर्णता’ में ही विचार किया जाना चाहिए । 

साहित्य के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार 

  • मुझे स्वदेश-प्रेम, जीवन-दर्शन, प्रकृति तथा मधुर भाव की कविताएं बाल्यावस्था से ही उगकर्षित करती रही हैं ।  
  • ‘रामचरितमानस’ तो मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है । जीवन की समग्रता का जो वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने किया है, वैसा विश्व-साहित्य में नहीं हुआ है । 
  • साहित्य और राजनीति के कोई अलस-अलग खाने नहीं होते । जो राजनीति में रुचि लेता है, वह साहित्य के लिए समय नहीं निकाल पाता और साहित्यकार राजनीति के लिए समय नहीं दे पाता, लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं, जो दोनों के लिए समय देते हैं । वे अभिनन्दनीय हैं ।
  • साहित्यकार का हृदय दया, क्षमा, करुणा और प्रेम से आपूरित रहता है । इसलिए वह खून की होली नहीं खेल सकता । 
  • मेरे भाषणों में मेरा लेखक ही बोलता है, पर ऐसा नहीं कि राजनेता मौन रहता है । मेरे लेखक और राजनेता का परस्पर समन्वय ही मेरे भाषणों में उतरता है । यह जरूर है कि राजनेता ने लेखक से बहुत कुछ पाया है ।. साहित्यकार को अपने प्रति सच्चा होना चाहिए । उसे समाज के लिए अपने दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए । उसके तर्क प्रामाणिक हो । उसकी दृष्टि रचनात्मक होनी चाहिए । वह समसामयिकता को साथ लेकर चले, पर आने वाले कल की चिंता जरूर करे । 

खुद के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार 

  • निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक ऊंचा उठाकर देखें । विश्व के गगनमंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं । 
  • सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केन्द्र बिंदु व्यक्ति रहा है । हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्रह्मांड और सृष्टि का मूल व्यक्ति औरउसका संपूर्ण विकास है ।
  • राष्ट्रशक्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दस शीशों के रूप में सव्याज चुकाना पड़ा । असुरों की लंका भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कन्दकली की भांति सुशोभित हुई । धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ ।

शिक्षा के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार 

  • शिक्षा आज व्यापार बन गई है । ऐसी दशा में उसमें प्राणवत्ता कहां रहेगी? उपनिषदों या अन्य प्राचीन ग्रंथों की उगेर हमारा ध्यान नहीं जाता । आज विद्यालयों में छात्र थोक में आते हैं । 
  • शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है । व्यक्तित्व के उत्तम विकास के लिए शिक्षा का स्वरूप आदर्शों से युक्त होना चाहिए । हमारी माटी में आदर्शों की कमी नहीं है । शिक्षा द्वारा ही हम नवयुवकों में राष्ट्रप्रेम की भावना जाग्रत कर सकते हैं । 
  • मुझे शिक्षकों का मान-सम्मान करने में गर्व की अनुभूति होती है । अध्यापकों को शासन द्वारा प्रोत्साहन मिलना चाहिए । प्राचीनकाल में अध्यापक का बहत सम्मान था।आज तो अध्यापक पिस रहा है। 
  • किशोरों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है । आरक्षण के कारण योग्यता व्यर्थ हो गई है । छात्रों का प्रवेश विद्यालयों में नहीं हो पा रहा है । किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता । यह मौलिक अधिकार है । 
  • निरक्षरता का और निर्धनता का बड़ा गहरा संबंध है । 
  • वर्तमान शिक्षा-पद्धति की विकृतियों से, उसके दोषों से, कमियों से सारा देश परिचित है । मगर नई शिक्षा-नीति कहां है? 
  • शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए । ऊंची-से-ऊंची शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए । 
  • मोटे तौर पर शिक्षा रोजगार या धंधे से जुड़ी होनी चाहिए । वह राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में सहायक हो और व्यक्ति को सुसंस्कारित करे ।

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