"अटल जी" एक महायुग का अवसान


"अटल जी" एक महायुग का अवसान

राष्ट्रपति में अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री में शास्त्री जी और "अटल जी" का नाम अमर रहेगा। अटल जी सार्वजनिक जीवन पर इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी वे सामान्य जन के प्रति बेहद संवेदनशील थे. 'वो वजीर-ए-आजम नहीं, हिंदुस्‍तान के दिलों के मालिक थे.'
'काल के कपाल पर लिखने-मिटाने' वाली वह अटल आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार शाम एम्स में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 93 साल के थे। एम्स ने शाम को बयान जारी कर बताया, 'पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 अगस्त 2018 को शाम 05.05 बजे अंतिम सांस ली। पिछले 36 घंटों में उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी। हमने पूरी कोशिश की पर आज उन्हें बचाया नहीं जा सका।' वाजपेयी को यूरिन इन्फेक्शन और किडनी संबंधी परेशानी के चलते 11 जून को एम्स में भर्ती कराया गया था। मधुमेह के शिकार वाजपेयी का एक ही गुर्दा काम कर रहा था। 

राष्ट्रपति में अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री में शास्त्री जी और वाजपेयी का नाम अमर रहेगा।

बुधवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनका हालचाल जानने एम्स पहुंचे थे। इसके बाद वह गुरुवार दोपहर फिर एम्स गए। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी दो बार एम्स पहुंचे। इसके अलावा बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई केंद्रीय मंत्री एम्स पहुंचे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई विपक्षी दलों के नेता पूर्व प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लेने गुरुवार को एम्स पहुंचे थे। इससे पहले वाजपेयी के रिश्तेदारों को भी एम्स बुला लिया गया था। 

तीन बार बने प्रधानमंत्री

बीजेपी के संस्थापकों में शामिल वाजपेयी 1996 से 1999 के बीच तीन बार पीएम चुने गए। वह पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार सिर्फ 13 दिनों तक ही रह पाई। 1998 में वह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तब उनकी सरकार 13 महीने तक चली। 1999 में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा किया। 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले वह पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। 

जब अटल ने कविता से दिया अपना परिचय 

वह 10 बार लोकसभा के लिए और 2 बार राज्यसभा के लिए चुने गए। उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को 'गुड गवर्नेंस डे' के तौर पर मनाया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी पार्टी ही नहीं विपक्षी नेता भी उनकी बातों को तल्लीनता से सुनते थे और उनका सम्मान करते थे। 

2005 में लिया राजनीति से संन्यास

कभी अपनी कविताओं और भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध करने वाले वाजपेयी स्वास्थ्य खराब होने के कारण सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए थे। 2005 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था और तब से वह अपने घर पर ही थे। अटल बिहारी वाजपेयी को कई वर्षों से बोलने और लिखने में भी तकलीफ होती थी। वह किसी को पहचान भी नहीं पा रहे थे। 

2015 में सामने आई थी आखिरी तस्वीर

आखिरी बार उनकी तस्वीर साल 2015 में सामने आई थी जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनके आवास पर जाकर उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया था। 

डिमेंशिया से पीड़ित थे वाजपेयी

देश के पूर्व प्रधानमंत्री डिमेंशिया (मनोभ्रांस ) नाम की बीमारी से भी लंबे समय से पीड़ित थे। डिमेंशिया किसी खास बीमारी का नाम नहीं है बल्कि यह ऐसे लक्षणों को कहते हैं जब इंसान की मेमरी कमजोर हो जाती है और वह अपने रोजमर्रा के काम भी ठीक से नहीं कर पाता। डिमेंशिया से पीड़ित लोगों में शॉर्ट टर्म मेमरी लॉस जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं। ज्यादातर डिमेंशिया के केसों में 60 से 80 प्रतिशत केस अलजाइमर के होते हैं। डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति के मूड में भी बार-बार बदलाव आता रहता है। वे जल्दी परेशान हो जाते हैं या ज्यादातर वे उदास या दुखी रहने लगते हैं।

जब UN में सुनाई दी हिंदी की गूंज

1977 में जनता पार्टी की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे। उन्हें दुनिया के सबसे बड़े मंच पर भाषण देने का मौका मिला। वाजपेयी के हिंदी में दिए शानदार भाषण से अभिभूत UN के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर तालियां बजाईं थीं। वाजपेयी ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' का संदेश देते हुए मानवाधिकारों की रक्षा के साथ-साथ रंगभेद जैसे गंभीर मुद्दों का जिक्र किया था। 

भावपूर्ण श्रद्वांजलि

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भावुक हो गए. बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि अटल जी से हमनें बहुत कुछ सीखा और हमनें उनसे बहुत कुछ पाया है. अटल जी ने जो कुछ हमें सिखाया उसको ग्रहण करके हम सभी अपना जीवन व्यतीत करें. उन्होंने कहा कि ये मेरा सौभाग्य है कि मेरी मित्रता अटल जी के साथ 65 वर्षों तक रही. उन्होंने कहा, 'मैंने अटलजी के साथ मिलकर बहुत सारे अनुभव किए, साथ-साथ काम किए, पुस्तकें पढ़ते थे. फिल्में देखते थे.

वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अटल जी को लोकप्रियता देश का प्रधानमंत्री बनने के कारण हासिल नहीं हुई. वह किसी भी राजनीतिक या सामाजिक क्षेत्र में यदि काम करते तो वह वैसे ही लोकप्रिय होते जैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकप्रिय हुए. राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को अटल जी के निधन की पीड़ा है. सबको साथ लेकर चलने की कला श्रद्धेय अटल जी में थी.

वहीं, प्रार्थना सभा में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि 'अटल जी के शब्‍द और उनका जीवन. चाहे किसी ने उन्‍हें करीब से देखा हो या दूर से, सभी ने उन्‍हें एक जैसा ही पाया और उनपर भरोसा किया.' भागवत ने कहा कि मुझे अटल जी का सानिध्य ज्यादा नहीं मिला, पर तरुण अवस्था में मैं भी उनका भाषण सुनने के लिए जाया करता था. अटल जी की सबके साथ मित्रता थी, सार्वजनिक जीवन पर इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी वे सामान्य जन के प्रति बेहद संवेदनशील थे.
 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि 'अपनी मौत के बाद भी वो हमें एक कमरे में साथ ले आए, यह बहुत बड़ी बात है.'

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्‍मृति में आयोजित प्रार्थना सभा में जम्‍मू कश्‍मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री फारूक अब्‍दुल्‍ला ने कहा कि 'वो वजीर-ए-आजम नहीं, हिंदुस्‍तान के दिलों के मालिक थे. वो विशाल हृदय वाले थे.'

अटल स्मृतियां

ठन गई! मौत से ठन गई!जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
 
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?
 
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
 
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

अटल जी के अस्पृश्यता के बारे में विचार

  • अगर परमात्मा भी आ जाए और कहे कि छुआछूत मानो, तो मैं ऐसे परमात्मा को भी मानने को तैयार नहीं हूं किंतु परमात्मा ऐसा कह ही नहीं सकता । 
  • मानव और मानव के बीच में जो भेद की दीवारें खड़ी हैं, उनको ढहाना होगा, और इसके लिए एक राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है । 
  • अस्पृश्यता कानून के विरुद्ध ही नहीं, वह परमात्मा तथा मानवता के विरुद्ध भी एक गंभीर अपराध है ।
  • मनुष्य-मनुष्य के बीच में भेदभाव का व्यवहार चल रहा है । इस समस्या को हल करने के लिए हमें एक राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है ।
  • हरिजनों के कल्याण के साथ गिरिजनों तथा अन्य कबीलों की दशा सुधारने का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है ।

अटल जी के हिंदी और अंग्रेजी भाषा के बारे में विचार

  • हिन्दी की कितनी दयनीय स्थिति है, यह उस दिन भली-भांति पता लग गया, जब भारत-पाक समझौते की हिन्दी प्रति न तो संसद सदस्यों को और न हिन्दी पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई ।
  • हिन्दी वालों को चाहिए कि हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी को पूरी तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करें । 
  • हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया । हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रान्तों से उठी । स्वामी दयानन्दजी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे । हिन्दी हमारी आजादी के आन्दोलन का एक कार्यक्रम बनी ।
  • भारत की जितनी भी भाषाएं हैं, वे हमारी भाषाएं हैं, वे हमारी अपनी हैं, उनमें हमारी आत्मा का प्रतिबिम्ब है, वे हमारी आत्माभिव्यक्ति का साधन हैं । उनमें कोई छोटी-बड़ी नहीं है । 
  • भारतीय भाषाओं को लाने का निर्णय एक क्रांतिकारी निर्णय है, लेकिन अगर उससे देश की एकता खतरे में पड़ती है तो अहिन्दी प्रांत वाले अंग्रेजी चलाएं, मग्र हम पटना में, जयपुर में, लखनऊ में अंग्रेजी नहीं चलने देंगे । 
  • राष्ट्र की सच्ची एकता तब पैदा होगी, जब भारतीय भाषाएं अपना स्थान ग्रहण करेंगी । 
  • हिन्दी का किसी भारतीय भाषा से झगड़ा नहीं है । हिन्दी सभी भारतीय भाषाओं को विकसित देखना चाहती है, लेकिन यह निर्णय संविधान सभा का है कि हिन्दी केन्द्र की भाषा बने । 
  • अंग्रेजी केवल हिन्दी की दुश्मन नहीं है, अंग्रेजी हर एक भारतीय भाषा के विकास के मार्ग में, हमारी संस्कृति की उन्नति के मार्ग में रोड़ा है । जो लोग अंग्रेजी के द्वारा राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना चाहते हैं वे राष्ट्र की एकता का मतलब नहीं समझते । 

अटल जी के जनतंत्र के बारे में विचार

  • हमारा लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है । लोकतंत्र की परंपरा हमारे यहां बड़ी प्राचीन है ।. चालीस साल से ऊपर का मेरा संसद का अनुभव कभी-कभी मुझे बहुत पीड़ित कर देता है । हम किधर जा रहे हैं? 
  • राज्य को, व्यक्तिगत संपत्ति को जब चाहे जब्त कर लेने का अधिकार देना एक खतरनाक चीज होगी । 
  • भारत के लोग जिस संविधान को आत्म समर्पित कर चुके हैं, उसे विकृत करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता ।
  • लोकतंत्र बड़ा नाजुक पौधा है । लोकतंत्र को धीरे- धीरे विकसित करना होगा । केन्द्र को सबको साथ लेकर चलने की भावना से आगे बढ़ना होगा । 
  • अगर किसी को दल बदलना है तो उसे जनता की नजर के सामने दल बदलना चाहिए । उसमें जनता का सामना करने का साहस होना चाहिए । हमारे लोकतंत्र को तभी शक्ति मिलेगी जब हम दल बदलने वालों को जनता का सामना करने का साहस जुटाने की सलाह देंगे । 
  • हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखण्डता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है । 
  • लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें बिना मृणा जगाए विरोध किया जा सकता है और बिना हिंसा का आश्रय लिए शासन बदला जा सकता है । 
  • जातिवाद का जहर समाज के हर वर्ग में पहुंच रहा है । यह स्थिति सबके लिए चिंताजनक है । हमें सामाजिक समता भी चाहिए और सामाजिक समरसता भी चाहिए ।

अटल जी के राजनीति के बारे में विचार

  • कर्सी की मुझे कोई कामना नहीं है। मुझे उन पर दया उगती है जो विरोधी दल में बैठने का सम्मान छोड्‌कर कुर्सी की कामना से लालायित होकर सरकारी पार्टी का पन्तु पकड़ने के लिए लालायित हैं ।
  • वास्तव में हमारे देश की लाठी कमजोर नहीं है, वरन् वह जिन हाथों में है, वे कांप रहे हैं । 
  • मैं हिन्दू परम्परा में गर्व महसूस करता हूं लेकिन मुझे भारतीय परम्परा में और ज्यादा गर्व है ।
  • भारत की सुरक्षा की अवधारणा सैनिक शक्ति नहीं है । भारत अनुभव करता है सुरक्षा आन्तरिक शक्ति से आती है । 
  • राजनीति सर्वांग जीवन नहीं है । उसका एक पहलू है । यही शिक्षा हमने पाई है, यही संस्कार हमने पाए हैं । 
  • जहां-जहां हमें सत्ता द्वारा सेवा का अवसर मिला है, हमने ईमानदारी, निष्पक्षता तथा सिद्धांतप्रियता का परिचय दिया है । 
  • इस त् संसार में यदि स्वाधीनता की, अखण्डता की रक्षा करनी है तो शक्ति के और शस्त्रों के बल पर होगी, हवाई सिद्धांतों के जरिए नहीं ।
  • बिना हमको सफाई का मौका दिए फांसी पर चढ़ाने की कोशिश मत करिए, क्योंकि हम मरते-मरते भी लड़ेंगे और लड़ते-लड़ते भी मरने को तैयार हैं ।
  • राजनीति काजल की कोठरी है । जो इसमें जाता है, काला होकर ही निकलता है । ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में ईमानदार होकर भी सक्रिय रहना, बेदाग छवि बनाए रखना, क्या कठिन नहीं हो गया है? 
  • अगर हम देशभक्त न होते और अगर हम निःस्वार्थ भाव से राजनीति में अपना स्थान बनाने का प्रयास न करते और हमारे इन प्रयासों के साथ साल की साधना न होती तो हम यहां तक न पहुंचते ।

अटल जी के समाज और भ्रष्टाचार के बारे में विचार

  • पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव-समाज प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है । 
  • दरिद्रता का सर्वथा उन्मूलन कर हमें प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार कार्य लेना चाहिए और उसकी आवश्यकता के अनुसार उसे देना चाहिए । 
  • संयुक्त परिवार की प्रणाली सामाजिक सुरक्षा का सुंदर प्रबंध था, जिसने मार्क्स को भी मात कर दिया था । 
  • समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी-नवनिर्माण के प्राचीन आधारस्तम्भ हैं । इन्हीं स्तम्भों पर हमें भावी भारत का भवन खड़ा करना है । 
  • जब तक सरकार काले धन की समस्या का कारगर हल नहीं निकालती, कितने भी कानून बनाए जाएं, जमीन और इमारतों का व्यापार फूलता-फलता रहेगा । 
  • अगर भ्रष्टाचार का मतलब यह है कि छोटी-छोटी मछलियों को फांसा जाए और बड़े-बड़े मगरमच्छ जाल में से निकल जाएं तो जनता में विश्वास पैदा नहीं हो सकता । 
  • हम अगर देश में राजनीतिक और सामाजिक अनुशासन पैदा करना चाहते हैं तो उसके लिए भ्रष्टाचार का निराकरण आवश्यक है । हमें बेदाग नेतृत्व चाहिए, हमें निष्कलंक नेतृत्व चाहिए । 
  • आपको मालूम है, यह भ्रष्टाचार फैलते-फैलते नीचे किस हद तक गया है । हमारे बिहार प्रदेश में जानवरों का चारा खा लिया गया है । काले धन से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए । इसका प्रबंध किया जाना चाहिए । कठोर-से-कठोर कदम उठाना चाहिए । 

अटल जी के सांप्रदायिकता और पाकिस्तान के बारे में विचार

मुसलमानों में कुछ लोग ऐसे हैं जो पाकिस्तान से संबंध रखते हैं, जो पाकिस्तान के इशारे पर दंगे करते हैं । पाकिस्तान हमें बदनाम करना चाहता है ।राष्ट्र के प्रति अव्यभिचारी निष्ठा और आने वाले कल के लिए निरंतर पसीना तथा आवश्यकता पड़ने पर रक्त बहाने का संकल्प ही हमें सांप्रदायिकता, भाषावाद तथा क्षेत्रीयता से ऊपर उठने की प्रेरणा दे सकता है । सांप्रदायिकता किसी भी रूप में हो, उसे कुचल दीजिए, सांप्रदायिकता के नाम पर आप एक संप्रदाय के तुष्टीकरण की नीति अपनाएं, इसका आज असर नहीं होगा । अगर चिनगारी गिरेगी तो आग भड़केगी । वन्देमातरम् इस्ताम का विरोधी नहीं है । क्या इस्ताम को मानने वाले जब नमाज पढ़ते हैं तो इस देश र्को धरती पर, इस देश की पाक जमीन पर सिर नहीं टेकते हैं? अब चिकनी-चुपड़ी बातें करने का वक्त नहीं है । परिस्थिति गंभीर है । देश की एकता दांव पर लगी है । सांप्रदायिकता के ज्वार में राष्ट्र की नौका डगमगा रही है । पानी हमारे सिर तक पहुंच गया है । ऐसा इस सदन में तो क्या, देश-भर में भी कोई नहीं होगा जो शिवाजी के प्रति आदर न रखता हो,. लेकिन उनके नाम का इस्तेमाल सांप्रदायिकता भड़काने के लिए करना किसी भी तरह शिवाजी कें प्रति न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता । आज सांप्रदायिकता के साथ देश के भीतर जातीयता का जहर किस तरह से फैलाया जा रहा है, वह क्या सांप्रदायिकता से कम घातक है? 

पाकिस्तान के चालक आगरा जाने की बार-बार कोशिश करते थे । आगरा केवल ताजमहल के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है । एक दूसरी बात के लिए भी प्रसिद्ध है । आगरा में हिन्दूस्तान का सबसे बड़ा पागलखाना है । हमने पाकिस्तान की पनडुब्बी डुबा दी । वे कहने लगे, यह डूबी नहीं, गोता खा रही है । भारत में जो पाकिस्तानी रहते हैं, जिनकी संख्या का हमें पता है, हम क्यों नहीं उनसे भारत छोड्‌कर जाने के लिए कहते । हमें पाकिस्तान से कह देना चाहिए कि पाकिस्तान पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दूओं के साथ न्याय नहीं करेगा तो भारत की शक्ति में जो भी कदम होगा, उठाएगा । जब-जब पाकिस्तान को कुछ लेना होता है, वह शांति की भाषा बोलता है । जहां तक भारत का संबंध है, हम विश्वकुटश्व के कल्याण के लिए कष्ट सहने और पसीना बहाने के लिए तैयार हैं । 

  • मेरा कहना है कि सबके साथ दोस्ती करें लेकिन राष्ट्र की शक्ति पर विश्वास रखें । राष्ट्र का हित इसी में है कि हम आर्थिक दृष्टि से सबल हों, सैन्य दृष्टि से स्वावलम्बी हों । 
  • पाकिस्तान कश्मीर, कश्मीरियों के लिए नहीं चाहता । वह कश्मीर चाहता है पाकिस्तान के लिए । वह कश्मीरियों को बलि का बकरा बनाना चाहता है । 
  • मैं पाकिस्तान से दोस्ती करने के खिलाफ नहीं हूं । सारा देश पाकिस्तान से संबंधों को सुधारना चाहता है, लेकिन जब तक कश्मीर पर पाकिस्तान का दावा कायम है, तब तक शांति नहीं हो सकती ।
  • पाकिस्तान हमें बार-बार उलझन में डाल रहा है, पर वह स्वयं उलझ जाता है । वह भारत के किरीट कश्मीर की ओर वक्र दृष्टि लगाए है । कश्मीर भारत का अंग है और रहेगा । हमें पाकिस्तान से साफ-साफ कह देना चाहिए कि वह कश्मीर को हथियाने का इरादा छोड़ दे । 

अटल जी के विदेश नीति के बारे में विचार 

  • हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएंगे । 
  • एटम बम का जवाब क्या है? एटम बम का जवाब एटम बम है और कोई जवाब नहीं ।
  • कौन हमारे साथ है? कौन हमारा मित्र है? इस विदेश नीति ने हमको मित्रविहीन बना दिया है । यह विदेश नीति राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करने में विफल रही है । 
  • इस विदेश नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए । कल्पना के लोक से उतरकर हम अपनी विदेश नीति का निर्धारण करें ।
  • हम अपने घर में एक-दूसरे को प्रॉग्रेसिव कह सकते हैं, रिएक्शनरी कह सकते हैं, लेकिन रूस को इजाजत नहीं दे सकते कि हमारे देश के घरेलू मामलों में दखल दे और किसी को प्रॉग्रेसिव और किसी को रिएक्शनरी कहे ।
  • नेपाल हमारा पड़ोसी देश है । दुनिया के कोई देश इतने निकट नहीं हो सकते जितने भारत और नेपाल हैं । 
  • इतिहास ने, भूगोल ने, परंपरा ने, संस्कृति ने, धर्म ने, नदियों ने हमें आपस में बांधा है । 

अटल जी के जवान और किसान के बारे में विचार

  • सेना के उन जवानों का अभिनन्दन होना चाहिए, जिन्होंने अपने रक्त से विजय की गाथा लिखी विजय का सर्वाधिक श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है तो हमारे बहादुर जवानों को और उनके कुशल सेनापतियों को । अभी मुझे ऐसा सैनिक मिलना बाकी है, जिसकी पीठ में गोली का निशान हो । जितने भी गोली के निशान हैं, सब निशान सामने लगे हैं । 
  • अगर अपनी सेनाओं या रेजिमेंटों के नाम हमें रखने हैं तो राजपूत रेजिमेंट के स्थान पर राणा प्रताप रेजिमेंट रखें, मराठा रेजिमेंट के स्थान पर शिवाजी रेजिमेंट और ताना रेजिमेंट रखे, सिख रेजिमेंट की जगह रणजीत सिंह रेजिमेंट रखें । 
  • खेती भारत का बुनियादी उद्योग है । 
  • अन्नोत्पादन द्वारा आत्मनिर्भरता के बिना हम न तो औद्योगिक विकास का सुदृढ़ ढांचा ही तैयार कर सकते है और न विदेशों पर अपनी खतरनाक निर्भरता ही समाप्त कर सकते हैं । 
  • हमारा कृषि-विकास संतुलित नहीं है और न उसे स्थायी ही माना जा सकता है ।  
  • कृषि-विकास का एक चिंताजनक पहलू यह है कि पैदावार बढ़ते ही दामों में गिरावट आने लगती है । 

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