राम जन्मभूमि विवाद


राम जन्मभूमि विवाद

हिन्दुओं की मान्यता है कि श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और उनके जन्मस्थान पर एक भव्य मन्दिर विराजमान था जिसे मुगल आक्रमणकारी बाबर ने तोड़कर वहाँ एक मसजिद बना दी। १८५९ में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा। १९४९ में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।

राम जन्मभूमि विवाद 

हिन्दुओं की मान्यता है कि श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और उनके जन्मस्थान पर एक भव्य मन्दिर विराजमान था जिसे मुगल आक्रमणकारी बाबर ने तोड़कर वहाँ एक मसजिद बना दी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में इस स्थान को मुक्त करने एवं वहाँ एक नया मन्दिर बनाने के लिये एक लम्बा आन्दोलन चला। ६ दिसम्बर सन् १९९२ को यह विवादित ढ़ांचा गिरा दिया गया और वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया।

एक पक्ष ने कहा मामला संवैधानिक पीठ में जाए, अन्य ने कहा जल्द निपटाएं.सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई करने की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट में इसके बाद से यह मामला लंबित है.

विवाद की ये है पुरानी कहानी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ अयोध्या विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 13 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ के इस विवादित स्थल को इस विवाद के तीनों पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और भगवान राम लला के बीच बांटने का आदेश दिया था.बता दें कि राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था. इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था. फैसले में कहा गया था कि विवादित लैंड को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाए, जिस जगह रामलला की मूर्ति है उसे रामलला विराजमान को दिया जाए. सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए जबकि बाकी का एक तिहाई जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए. सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान और हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. वहीं, दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी. इसके बाद इस मामले में कई और पक्षकारों ने याचिकाएं लगाई. 

राम जन्मभूमि इतिहास

राम जन्मभूमि विवाद का संक्षिप्त इतिहास इस प्रकार से है:

  • १५२८ में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था।
  • १८५३ में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर पहली बार विवाद हुआ।
  • १८५९ में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा।
  • १९४९ में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।
  • सन् १९८६ में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की।
  • सन् १९८९ में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी जमीन पर राम मंदिर की मुहिम शुरू की।
  • ६ दिसम्बर १९९२ को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।
  • उसके दस दिन बाद १६ दिसम्बर १९९२ को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।
  • लिब्रहान आयोग को१६ मार्च १९९३ को यानि तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में १७ साल लगाए।
  • ३० जून २००९ को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में ७०० पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपा।
  • जांच आयोग का कार्यकाल ४८ बार बढ़ाया गया।
  • ३१ मार्च २००९ को समाप्त हुए लिब्रहान आयोग का कार्यकाल को अंतिम बार तीन महीने अर्थात् ३० जून तक के लिए बढ़ा गया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फ़ैसले

2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उच्चतम न्यायालय ने ७ वर्ष बाद निर्णय लिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया और 70 वर्ष बाद 30 मार्च 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जिसमें मस्जिद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित अर दिया गया था ।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 5 फरवरी 2018 से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि नमाज़ की आवश्यकता पर की गई इस टिप्पणी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 में आए फ़ैसले और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर की गई याचिकाओं को प्रभावित किया था. और चूंकि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में पांच जजों का फ़ैसला था इसलिए मौजूदा तीन जजों की बेंच को इसकी सुनवाई नहीं करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इसी प्रश्न की समीक्षा की और अंततः 2:1 से किए निर्णय से तय कर दिया कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में की गईं टिप्पणियां ज़मीन अधिग्रहण के संदर्भ में की गईं थीं और इसलिए बड़ी बेंच के समक्ष भेजे जाने की अपील को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. और किसी फ़ैसले में की गईं टिप्पणियों को उसमें उठाए गए मुद्दे के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए.

ये राय जस्टिस अशोक भूषण ने ज़ाहिर की और भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस पर सहमति जताई. जस्टिस मिश्रा इसी साल दो अक्तूबर को रिटायर हो रहे हैं.

लेकिन ये भी ग़ौर करने लायक़ बात है कि बेंच के तीसरे जज जस्टिस नज़ीर ने असहमति जताते हुए कहा कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में की गईं टिप्पणियों को बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए क्योंकि पहले दिए गए कई फ़ैसलों की रोशनी में इस सवाल की विस्तृत समीक्षा होनी चाहिए कि क्या कोई क्रिया किसी धर्म का अभिन्न हिस्सा है या नहीं.

अयोध्या में राम जन्मभूमि मामला:

29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच करेगी सुनवाई

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच सुनवाई करेगी. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में शुरुआती सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी और उस दिन ही नियमित सुनवाई की तारीख तय होगी. चीफ जस्टिर रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी. 

इससे पहले तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एम खानविलकर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच ने 2:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि 1994 के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है जिसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है.

इसके साथ ही बेंच ने कहा था कि 1994 का इस्माइल फारुखी फैसला सिर्फ जमीन अधिग्रहण को लेकर था. संविधान पीठ ने कहा था कि जमीनी विवाद से इसका लेना देना नहीं इसलिए सिविल मामले की सुनवाई होगी. हालांकि जस्टिस नजीर ने इससे असहमति जताते हुए कहा था कि संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार हो. जस्टिस मिश्रा तीन अक्तूबर को रिटायर हो चुके हैं. अब ये नई पीठ बनाई गई है.


बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि पर मेरिट से होगा फ़ैसला

  • भारत की सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2:1 से विभाजित एक फ़ैसले में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक़ से जुड़े मामले में की गई अपील को पांच या अधिक जजों की बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया. इसके दो स्पष्ट संदेश हैं जिन्हें सभी देख सकते हैं.
  • पहला यह कि अयोध्या मामले में मालिकाना हक़ पर सुनवाई पूरी तरह से केस के मेरिट के आधार पर ही की जाएगी और दूसरा यह कि संवैधानिक बेंच को भेजने पर जजों का मत विभाजित था और जस्टिस नज़ीर फ़ैसला सुनाते हुए केस के 'संदर्भ' की सरल व्याख्या पर बेंच में शामिल दो अन्य जजों से सहमत नहीं हुए.
  • बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ वाले केस को अधिक जजों की पीठ के पास भेजे जाने की मुसलमान पक्ष की अपील की असल वजह 1994 में इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में की गईं पांच जजों की बेंच की टिप्पणियों से जुड़ी हैं.
  • 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत अधिग्रहित की गई कुछ ज़मीन के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका पर फ़ैसले में अदालत ने कहा था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम धर्म में न ज़रूरी है और न ही धर्म का अभिन्न अंग है. ये अदालत विवादित जगह पर हिंदू मंदिर होने या न होने के बारे में राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए प्रश्न पर भी सुनवाई कर रही थी.

संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत 

जस्टिस नज़ीर की राय थी कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में की गई ये टिप्पणी कि 'मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है और मुसलमान कहीं भी नमाज़ पढ़ सकते हैं, यहां तक कि खुले स्थान में भी' पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना की गई थी और धार्मिक स्वतंत्रता देने वाले भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी धर्म के लिए क्या 'ज़रूरी' और 'अभिन्न' माना जाए, इसका समाधान होना चाहिए.

अदालत के समक्ष पेश इस बात पर कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में की गई टिप्पणियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को प्रभावित किया है, तीनों जजों ने सहमति जताई कि इस मत-विभाजित फ़ैसले में सिर्फ़ इन्हें निर्णायक कारक न माना जाए. बेंच ने रेस्पोंडेन्ट्स (प्रतिवादी) की ओर से की गई रेस जुडिकाटा (वो मामला जिस पर पहले ही सक्षम अदालत फ़ैसला दे चुकी हो) की याचिका को भी सर्वसम्मति से इस आधार पर ख़ारिज कर दिया कि मौजूदा अपील ने अदालत के सामने अलग-अलग मुद्दों को उठाया है.

मामले को बड़ी संवैधानिक बेंच के समक्ष भेजने के पक्ष में एक और ठोस तर्क देते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि ये मामला एक 'महत्वपूर्ण मामला' है और पिछले कुछ समया में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ 'महत्वपूर्ण' होने के आधार पर ही कई मामलों को बड़ी बेंचों के पास भेजा है.

हालांकि ये तर्क भी सिर्फ़ असहमत जज जस्टिस नज़ीर को ही आकर्षित कर सका जिन्होंने 'बहुविवाह' और 'मादा जननांग विकृति' (फ़ीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन) के ख़िलाफ़ दायर मामलों को इसी आधार पर बड़ी बेंचों के पास भेजे जाने का उल्लेख किया. लेकिन बाक़ी दो जजों का मानना था कि आमतौर पर अपील को दो जजों की बेंच के पास भेजा जाता है, लेकिन मामले के महत्व को देखते हुए ही मौजूदा याचिकाओं की सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही है.

भविष्य पर असर

  • इस आदेश का असर भविष्य की कार्यवाहियों पर भी पड़ेगा. इस आदेश ने सबसे पहले तो समकालीन भारत के शायद सबसे चर्चित क़ानूनी विवाद यानी बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस को सुनने वाली बेंच की संख्या तय कर दी है. साथ ही, जस्टिस दीपक मिश्रा ने ये भी तय कर दिया है कि 29 अक्तूबर से इस मामले की सुनवाई शुरू होगी.
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के आदेश और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों में साफ़ दिखा था. और इससे याचिकाकर्ताओं को ज़रूर राहत मिली होगी जिन्होंने 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में इस्माइल फ़ारूक़ी मामले के प्रभाव की ओर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा था.
  • साथ ही, गुरुवार के फ़ैसले ने मुसलमानों के प्रार्थना करने (नमाज़ पढ़ने), यहां तक कि खुले स्थानों पर भी नमाज़ पढ़ने के अधिकार से कोई छेड़छाड़ नहीं की है. निकट भविष्य में इस वजह से कुछ रोचक चुनौतियां आ सकती हैं क्योंकि कई राज्यों में खुले स्थानों पर मुसलमानों के प्रार्थना करने से सांप्रदायिक तनाव हुए हैं. हाल के समय में खुले में यानी सरकारी ज़मीन पर नमाज़ पढ़ने को लेकर ख़ूब राजनीति देखी जा रही है.
  • लेकिन सबसे अहम बात ये है कि अपनी तमाम जटिलताओं के बावजूद न्याय प्रक्रिया बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि के इर्द-गिर्द हो रही राजनीति से पूरी तरह बेअसर है और यही इंसाफ़ का सही तक़ाज़ा है.



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