समाज, प्रकृति और विज्ञान


समाज, प्रकृति और विज्ञान

''हमारी सोच की दरिद्रता यह है कि हम सब कामों के लिए सरकार का मुंह देखते हैं। प्रकृति भी समाज की साझा सम्पदा है;  अमानत है उन पीढ़ियों की, जिन्हे अभी पैदा होना है। इसलिए समाज की ही जवाबदारी इन्हें बचाने की है।
''हमारी सोच की दरिद्रता यह है कि हम सब कामों के लिए सरकार का मुंह जोहते हैं। सबकी जवाबदारी सरकार की ही मानते हैं। यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में लोक ही असली नियामक है। यह प्रकृति भी समाज की साझा सम्पदा है; बल्कि अमानत है उन पीढ़ियों की, जिन्हे अभी पैदा होना है। समाज का ही इन पर अधिकार है और इसलिए समाज की ही जवाबदारी इन्हें बचाने की है।''

''जागो, उठो और अपनी धरती को बचाने में जुट जाओ, जिससे यह आने वाली पीढ़ियों के रहने लायक बनी रहे।''

बनाएं पानीदार समाज

अच्छा है कि किसी लंबी-चौड़ी भूमिका अथवा माननीयों के शुभकामना संदेशों में पन्ने बर्बाद करने की बजाय, सीधे एक पेजी अ'पनी बात' से शुरु होती है। कुल पांच शाीर्षक हैं। 'आओ, बनाएं पानीदार समाज' - प्रथम शाीर्षक है और 'अस्तित्व के आधार वन' - अंतिम शाीर्षक। 'रसायनों से मारी, खेती हमारी', 'बिन पानी सब सून' और 'धरती का बुखार' -   शाीर्षक युक्त तीन अन्य लेख काफी ज्ञानवर्धक और बुनियादी समझ से ओत-प्रोत हैं। बिन पानी सब सून - लेख में पानीदार नायकों की प्रेरक कथाएं हैं।इस की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस तथ्य को रेखांकित करने में पूरी तरह सफल है कि जब समाज का प्रकृति एजेण्डा प्रकृति के अनुकूल था, प्रकृति मानव के अनुकूल बनी रही; ज्यों-ज्यों समाज का प्रकृति एजेण्डा प्रकृति के प्रतिकूल होता गया, प्रकृति मानव के प्रतिकूल होती गई। तमाम बरबादियों देखते हुए भी क़ानून मौन है ! संवैधानिक संस्थाएं मौन हैं !! धर्म और अध्यात्म के श्रेष्ठिजन मौन हैं !!! जनता भी हाथ पर हाथ धरे अपनी अनमोल संपदा को लुटते हुए देख रही है !!!! आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की तो चिंता से ही ये गंभीर प्रश्न गायब है; क्योंकि उसका एजेण्डा तो मल्टीनेशनल कंपनियां तय करती हैं।' वृहद धर्मपुराण में ऋषि मनीषा का यह एक कथन, गंगा भूभाग का सारा  वैज्ञानिक गणित खोलकर सामने रख देता है। इतने विस्तार क्षेत्र में पापकर्म निषेध है।'

परम्परागत खेती 

दूसरा शाीर्षक, खेती पर आधारित है। शाीर्षक बताता है कि पूरे परिवार की स्वाभिमानपूर्वक उदर पोषण करने की क्षमता के कारण खेती को उत्तम माना जाता था। जिस कालखण्ड में यह कहा गया, उस समय खेती के लिए ज़मीन, बैल, बखर, हल, बीज और खाद जैसी ज़रूरी सभी चीजें किसान के सीधे स्वामित्व या नियंत्रण में थीं। इस तरह खेती को उत्तम मानने का एक कारण, किसान की आत्मनिर्भरता तथा कुछ हद तक स्वायतत्ता का होना भी था। खेती की परम्परागत प्रणालियों, मौसम की राजी-नाराजी के बीच सूखी खेती करने के कौशल, खेत की उपजाऊ शक्ति तथा शुद्धि बरकरार रखने की सावधानियों से लेकर बीज संरक्षित करने के परम्परागत हुनर तक का वर्णन करते हुए शाीर्षक पाठकों को उस मुकाम पर भी ले जाता है, जहां पहुंचकर भारतीय कृषि जगत में खेतिहर की आत्मनिर्भरता तथा स्वायतत्ता नष्ट होनी शुरु हुई। शाीर्षक, हरित क्रांति के प्रयोग का बेहद ज़मीनी आकलन प्रस्तुत करता है।

शाीर्षक बताता है कि विदेशी मूल के बीजों तथा रासायनिक खेती का स्वाद चखकर खेती की हमारी ज़मीनें कैसे-कैसे नशेड़ी बनी। प्रथम हरित क्रांति के साथ-साथ जीन में संशोधन वाले जी एम बीजों के रास्ते घुसपैठ में लगी दूसरी हरित क्रांति के खतरों का ब्यौरा काफी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। परम्परागत बीजों का संरक्षण, घड़े से टपक सिंचाई, जैविक खेती, ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती को समाधान के रूप में पेश करते हुए लेख के अंत में ऐसे बिंदु दिए गये हैं, जिन पर किसान से लेकर सरकार तक सभी संबंधित वर्गों को विचार करने की आवश्यकता है। यह गया , भारतीय कृषि में आये बिगाड़ को समझाने के लिए काफी है।

पानी रोको अभियान

मध्य प्रदेश शासन के 'पानी रोको अभियान' की अवधारणा को विकसित करने का श्रेय श्री व्यास जी को ही है। शीर्षक 'बिन पानी सब सून’ अवश्य है, किंतु यह शाीर्षक पानी की महत्ता बताने का काम कम,'का चुप साध रहेहु बलवाना...' की तर्ज पर भारतीय समाज को उसकी शक्ति बताने का दायित्व अधिक निभाता है। नीर से नारी का रिश्ता अधिक संवेदनशील, गहरा तथा दायित्वपूर्ण होता है। नर्मदा बचाओ आंदोलन में अपने जीवन के ज्यादातर वर्ष लगा चुकी मेधा पाटकर से लेकर हिमालय की मंदाकिनी घाटी में विस्फोट करने वाली परियोजनाओं को चुनौती देने वाली सुशीला भण्डारी, अपने जल संरक्षण के काम से 40 गांवों का भूगोल बदल देने वाली गुजरात की देबु बहन तथा कभी बागियों की दहाड़ों के लिए मशहूर करौली जिले में डांग का पानी लौटाने की हिम्मत जुटाने वाली छोटी, दरबी और नर्मदा जैसी कई बहनों की दास्तानें आज भी इसकी गवाह हैं। किंतु न मालूम क्यों, लेखक ने पानी की इन नायिकाओं को लेकर चुप्पी साधना बेहतर समझा ? पानी के लिए जीवन लगाने वाली एक भी नारी की दास्तान इस लेख में शामिल नहीं है। भारत के वनान्दोलनों की चर्चा करते हुए विश्नोई समाज की अमृता देवी तथा उनकी तीन पुत्रियों, चिपको आंदोलन में रेणी, गोपेश्वर तथा डूंगरी-पायटोली गांवों की माहिलाओं का मामूली जिक्र जरूर है, लेकिन यह भी शाीर्षक में आधी आबादी की महत्ता और हिस्सेदारी के अनुपात में उसकी भरपाई नहीं करता।

धरती का बुखार

'धरती का बुखार' शीर्षकयुक्त चैथा लेख लंबा अवश्य है, लेकिन यह वैश्विक स्तर आज सबसे बड़ी चुनौती के रूप में पेश किए जा रहे वायुमण्डलीय तापमान वृद्धि के अनेक पहलुओं पर व्यापक दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया गया है। शाीर्षक याद दिलाता है कि ध्वनि और गंध भी पृथ्वी के पर्यावरण का हिस्सा हैं। लेख में सूर्य में मौजूद गतिमान आवेशित कण की गति, सौर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र तथा अन्य गतिविधियों पर सूर्य के ताप का प्रभाव को काफी सरलता से समझाया गया है। बताया गया है कि कैसे एक ग्रीन हाउस बने रहते हुए ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास से लेकर ग्लोबल वार्मिंग के इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से रखते हुए लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिक व तकनीकी अविष्कारों के अलावा भिन्न कालखण्डों में उभरी भिन्न आर्थिक दृष्टियों ने ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को कैसे बढ़ाया। ओज़ोन परत में छिद्र से लेकर प्रदूषण के पहलुओं के भावी दुष्परिणामों को संक्षेप में रखते हुए लेखक ने समाधान की दशा, दिशा तथा उसमें युवा व मीडिया समेत भिन्न वर्गों की भूमिका सुझाई है; साथ ही सचेत किया है कि सिर्फ जानकारियों से समाधान हासिल नहीं होगा; समाधान हासिल करने के लिए मानसकिता बदलनी होगी और संकल्प साधना होगा।

जीवन का आधार वन

पांचवें लेख का शीर्षक - 'जीवन का आधार वन' है। वन हमारे जीवन का मूल आधार है । प्राणी मात्र का जीवन चक्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वनोंऔर वृक्षों पर ही निर्भर है । वृक्षों से ईधन, चारा, प्राणवायु, गोंद, शहद, छाया, नमी, औषधियाँ और जीवनोपयोगी अनेक योग्य चीजे मिलती है । वन और वृक्ष औषधि का अमिट भण्डार  है । मन को प्रसन्नता देने वाली हरियाली वनो पर ही आश्रित है । वर्षा चक्र में वनों की महत्ता को कोई कैसे नकार सकता है । आधुनिकता के दौर मेंवनों की उपेक्षा के कारण वनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है ।  विकसित देशों में कार्बन उत्सर्जन में कमी को लेकर चित्तांए तो कायम है परन्तु धरातल पर अभी तक वह नही हो पाया है जिसकी जरूरत महसूस की जा रही है । भारत में बड़ी आबादी के कारण यहां पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक है । धरती पर बढ़ती गर्मी से भारत की कृषि पर विपरीत असर पड़ सकता है । साथ ही खेती में परम्परागत तौर तरीके से काम ने होने से भी कृषि उपज पर प्रभाव पड़ना निश्चित है । रासायनिक खेती के कारण खेतों में अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है । 

घरेलू गैस को हर चूल्हे तक पहुंचाने से वृक्षों के कटाव पर तो एक सीमा तक कमी आयी है परन्तु बढ़ते औद्योगिकरण और रियल स्टेट कारोबार के तेजी से बढ़ने के कारण शहरी क्षेत्रोंके आसपास पेडो और बगीचो का कत्ल किया जा रहा है । यह चिंता का विषय है यद्यपि पौधारोपण के लिए समाज में एक वातावरण तैयार हुआ है परन्तु जब तक शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की हर खाली जमीन पर पौधे नहीं लगाए जाते हम ग्लोबल वार्मिग पर जीत हासिल नहीं कर सकते । पेड लगेगे प्रदूषण कम होगा, धरती पर नमी बढ़ेगी, ग्रीन हाउस गैसो का अवशोषण होगा इसलिए पौधे लगाए और उसे बचाए तभी धरती को बचाने में हमारी भूमिका निर्णायक हो सकती है ।

नगर के तेजी से होते विस्तार के बावजूद ’बंज्याणी’ के अस्तित्व को बचा पाने का श्रेय लोक वन प्रबंधन तथा लोक परम्पराओं को देते हैं। 'बंज्याणी' यानी बांज का जंगल। वन संरक्षण के उत्तम कार्य के लिए वह मेघालय-मणिपुर की देव वन परम्परा, उत्तराखण्ड की वन पंचायतों, ओडिशा राज्य की वन सुरक्षा समितियों तथा महाराष्ट्र के ज़िला गढ़ चिरौली के वृक्ष मित्रों को याद करना नहीं भूलते। शाीर्षक स्पष्ट करता है कि वनवासी नहीं, बल्कि वन नियंत्रण के लिए वर्ष 1865 में बने वन क़ानून, कालांतर में औद्योगीकरण तथा वन के प्रति व्यावसायिक दृष्टि ने भारत के जंगलों को बरबाद किया। लेखक का सुझाव है कि जिनके अस्तित्व का आधार ही वन हैं, उन्हे वनहितैषी तथा संरक्षक मानना चाहिए। इस दृष्टिकोण को आगे रखकर जंगल बचाने के कई उदाहरण भारत में मौजूद हैं। अतः जरूरी है कि वन प्रबंधन तथा वनाधिकारियों के दृष्टिकोण में मौलिक बदलाव किया जाये।


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