अश्कों का सहारा


अश्कों का सहारा

अपनों में भी गैर नजर  आते हैं ,
तूफां के साये मेें शूलों पे गुजारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।

अश्कों का सहारा

क्या गिला करें गर्दिशों में सितारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।

अपनों में भी गैर नजर  आते हैं ,
तूफां के साये मेें शूलों पे गुजारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।

बस कहकहों के लिए है अपनी जिन्दगी ,
गमों के पहलू में अश्कों का सहारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।

टुकड़े दिल के हो गये न जाने कितने ,
हर कतरे में अब तो जख्मों का नजारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने में मारा है ।

अब बोझ बन गई है जिन्दगी ,
रमेश गमें दरिया में मौत ही किनारा है ,
देखो हमें तो बेदर्द जमाने ने मारा है ।
रमेश चन्द्र सिंह ‘‘प्रियतम‘‘ शिवपुरी फतेहपुर



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