भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरें जो बन चुके हैं पर्यटन स्थल


भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरें जो बन चुके हैं पर्यटन स्थल

भारत को आजाद कराने में हमारे वीरों ने अपने प्राणों को कुर्बान कर दिया। भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद कराने के लिए भारत के लिए कई लड़ाई लड़ी गई, बहुत सारें आंदोलन किए गए स्वतंत्रा सेनानियों ने अपनी जान को हंसते हंसते कर्बान कर दिये। जिनको आज तक भारत ने अपने इतिहास के रुप में समेट कर रखा हुआ है जो अब पर्यटन के स्थल बन चुके हैं।


लखनऊ रेजीडेंसी

नवाबों के शहर में स्थित लखनऊ रेजीडेंसी आज उन मुख्य पर्यटनों में शामिल हैं जो भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरों में से एक है और प्रर्यटन का स्थल है। यहां ऐसी कई ऐतिहासिक चीजें हैं जिसे लोग दूर दूर से देखने आते हैं। लेकिन उन सभी चीजों के अलावा इस नवाबों के शहर में मौजूद हैं वो इमारत जो 1857 की क्रांति का गवाह बनी हैं। जो बयां करती हैं हमारे क्रांतिकारियों के 1857 का वो दौर जिसनें ब्रिटिश फौजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया और न सिर्फ विवश किया बल्कि  देश के वीरों ने ब्रिटिश हुकूमत को नाकों चने चबवाए। इस दिन मचे गदर ने लखनऊ की रेजीडेंसी में कुछ ऐसे निशान छोड़े जो आज भी 1857 की क्रांति का गवाह बनती है।

लाल किला

लाल किला उन मुख्य पर्यटनों में शामिल हैं जो भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरों में से एक है जो ना सिर्फ भारत अपितु पूरे विश्व में प्रसिध्द है जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं। 10 मई 1857 को मेरठ में क्रांति की शुरुआत हुईं और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ खुला विद्रोह कर दिया तब यह आन्‍दोलन मेरठ से बढ़ते हुए 11 मई को दिल्ली (Delhi) में प्रवेश कर गया और उन्होंने मुगल साम्राज्यके अंतिम बादशाह बहादुर शाह द्वितीय को हिंदुस्तान का सम्राट घोषित किया इससे अंग्रेज़ी शासन को बहुत बड़ा धक्का लगा लेकिन अंग्रेजों ने 21 सितंबर 1857 दिल्ली पर फिर अधिकार कर लिया।

इस आन्‍दोलन में हजारों लोगों की जान गई थी और अंग्रेजों ने बहादुर शाह द्वितीय को भी गिरफ़्तार कर लिया। बहादुर शाह को गिरफ़्तार करने के बाद उन पर लाल किले में ही जनवरी 1858 में दीवान-ए-ख़ास में मुकदमा चलाया गया। आपको बता दें कि बादशाह के खिलाफ़ लगभग 40 दिनों तक मुकदमा चला और उन्‍हें देश निकाले की सज़ा दी गई। बहादुरशाह को रंगून भेज दिया था इसके साथ ही कई स्‍वतंत्रता सेनानियों पर लाल किले में मुकदृमा चलाया गया था जो इतिहास के सुनहरें पन्नों में दर्ज हुआ।


झाँसी का किला

झाँसी का किला उत्तरी भारत के उत्तर प्रदेश की भंगीरा पहाड़ी पर स्थित है जो कि भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरों में से एक है जो अब  पर्यटन स्थल बन चुका है जिसे देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। इस किले का निर्माण 1613 में ओरछा साम्राज्य के शासक और बुन्देल राजपूत के चीफ बीर सिंह देव ने किया था। बुंदेला का यह सबसे शक्तिशाली गढ़ हुआ करता था। जिसे ब्रिटिशो ने अपने कब्जों में ले लिया। जिसे  मार्च 1854 में रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिशो को महल और किले को छोड़कर जाने के लिए ब्रिटिशो को 60,000 रुपये भी दिए थे। 1857 में विद्रोह टूट गया और लक्ष्मीबाई ने ही किले की बागडोर अपने हात में ले ली और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लक्ष्मीबाई झाँसी की सेना का नेतृत्व कर रही थी।


साबरमती आश्रम 

देश की आजादी में एक अतुल्य योगदान रखना वाला आश्रम, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कई जन आंदोलन का साक्षी बना वो है साबरमती आश्रम जो साबरमती नदी के किनारें स्थित है, जहां आज भी बापू की यादें जिंदा हैं। साबरमती आश्रम से ही महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम का ताना बाना बुनना शुरू किया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी ने गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया और यहां जीवन के कुछ नये प्रयोग किए जैसे खेती, पशु पालन और खादी। इसी आश्रम से महात्मा गांधी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम का ताना बाना बुनना शुरू किया।

जन आंदोलनों का नेतृत्व

गांधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई जन आंदोलनों का नेतृत्व किया और साबरमती आश्रम सत्याग्रह और डांडी मार्च जैसे आंदोलनों का साक्षी रहा। गांधी जी ने हालांकि 1933 में आज ही के दिन साबरमती आश्रम को छोड़ दिया, लेकिन उनकी यादों को आज भी इस आश्रम में सहेजकर रखा गया है।

इस आश्रम में हर रोज करीब 7लाख लोग घूमने आते हैं। हर रोज इस आश्रम के गेट आठ बजे से सात बजे तक खुलता है। इस आश्रम में आज भी वहीं चीजे मौजूद हैं जो महात्मा गांधी प्रयोग किया करते थे।
इस आश्रम को आज म्यूजियम घोषित किया जा चुका है जिसमें हाथ का चरखा और उनके द्रारा प्रयोग की गई लेखन की टेबल को आज भी वैसा ही रखा गया है जैसा वो गांधी जी के समय में था।
गांधी जी की उन सभी चीजों को आज भी वैसा ही रखा गया है जो जैसा था जो वहां गए लोगों को महसूस कराता है कि बापू इस देश को छोड़कर नहीं गए हैं बल्कि आज भी जिंदा है। उनकी चीजें जिदां हैं उनके साबरमती आश्रम में।
गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से ही दांडी मार्च आरम्भ किया था।

जलियांवाला बाग 

जलियांवाला बाग भारत के इतिहास (history of india) की सबसे क्रूरतम घटना है  जो कि 13 अप्रैल, 1919 बैसाखी के दिन घटित हुई थी। इस दिन 20 हजार भारत के वीरपुत्रों ने अमृतसर के जालियाँ वाले बाग में स्वाधीनता का यज्ञ रचा गया । जिसे देखने के लिए लोग आज भी वहां आते हैं। जो भारतीय स्वाधीनता की प्रमुख धरोहरों में से एक है और प्रर्यटन का स्थल बन चुका है।


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