रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए


रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए

Performed By: जगजीत सिंह
रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए
हम हवाओं की त़रह़ जा के उसे छू आए


बस गई है मिरे अह़सास में ये कैसी महक
कोई ख़ुश्बू मैं लगाऊँ तिरी ख़ुश्बू आए

उसनें छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया
मुद्दतों बा’द मिरी आँखों में आँसू आए

उसकी आँखें मुझे मीरा का भजन लगती हैं
पलकें झपकाए तो लोबान की ख़ुश्बू आए

मेरा आईना भी अब मेरी त़रह़ पागल है
आईना देखने जाऊँ तो नज़र तू आए

किस तकल्लुफ़ से गले मिलने का मौसम आया
फूल काग़ज़ के लिए काँच के बाज़ू आए

उन फ़क़ीरों को ग़ज़ल अपनी सुनाते रहियो
जिनकी आवाज़ में दरगाहों की ख़ुश्बू आए

वक़्त-ए-रुख़स़त कहीं तारे, कहीं जुगनू आए
हार पहनाने मुझे फूल से बाज़ू आए

मैंने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी
कोई आहट ना हो दर पै मिरे और तू आए

उसकी बातें कि गुल-ओ-लाला पै शबनम बरसे
सब को अपनाने का उस शोख़ को जादू आए

इन दिनों आपका आ़लम भी अ़जब आ़लम है
शोख़ खाया हुआ जैसे कोई आहू आए 

Artist: Jagjit Singh
Lyrics By: बशीर बद्र





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