अहिंसा दिवस पर पुलिस द्वारा हज़़ारों किसानों पर हिंसा


अहिंसा दिवस पर पुलिस द्वारा हज़़ारों किसानों पर हिंसा

किसान कहते हैं, हर जगह बिचौलिए हैं। खुद सरकारी अध‍िकारी इनसे मिले हुए हैं। ऐसे में किसान तक फायदा पहुंच ही नहीं पा रहा। सरकार ने डीजल के दाम बढ़ा दिए। ट्रैक्‍टर में 1 घंटे में 5 लीटर डीजल जल जाता है। किसानी अब घाटे का सौदा हो चला है। यात्रा में कई किसान ऐसे भी हैं जो सरकारी योजनाओं के उन तक न पहुंचने से नाराज हैं।

अहिंसा दिवस पर केंद्र सरकार की पुलिस द्वारा हज़़ारों किसानों पर हिंसा  

जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और 'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन मना रहा है, तब दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ आए हज़ारों किसानों पर पुलिस रबर की गोलियां, आंसू गैस के गोले चला रही थी. कई बार सूखा झेल चुके इन किसानों पर पानी की तेज़ बौछार का इस्तेमाल किया गया ताकि ये लोग दिल्ली में न घुस सकें.अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते ये किसान कहते हैं, ''चुनाव के वक़्त कर्ज़माफ़ी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं. किसानों के साथ मज़ाक बना रखा है. साढ़े चार साल हो गए. किसानों पर क़र्ज़ सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से है. झूठ बोल के वोट हासिल किए. अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे. ये हम पर गोलियां चला रहे हैं.''

भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले ये किसान अलग-अलग राज्यों से जुटे. यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में घुसने का इंतज़ार करते ट्रैक्टरों में बैठी महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कहती हैं- क़र्ज़माफ़ी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करो. जब ये हज़़ारों किसान दिल्ली के बॉर्डर पर रुके हुए थे, तब किसान यूनियन का एक प्रतिनिधि मंडल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल रहा था. ख़बर है कि सरकार और किसानों के बीच अहम मांगों को लेकर सहमति बन गई है. लेकिन एयरकंडीशन कमरों में हुई इन बैठकों की ख़बर सड़क पर बैठे हज़ारों किसानों को नहीं है. 

जैसे वो किसान नहीं अपराधी हों

कर्ज माफी और फसलों का लागत मूल्य से डेढ़ गुणा अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग को लेकर किसान आंदोलित हैं। शुक्रवार को किसानों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली कूच किया। कई किसान पुलिस प्रशासन की निगाहों के बचकर दिल्ली कूच करने में सफल रहे, जबकि कई किसानों को पुलिस ने पहले ही हिरासत में ले लिया। अकेले जींद में 50 से अधिक किसानों को हिरासत में लिया गया है। 

दिल्ली की सीमा से सटे इलाकों में बड़ी संख्या में पुलिस व अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। अपनी प्रस्तावित मांगों के लिए शुक्रवार को देशभर के 68 किसान संगठनों के बैनर तले लाखों की संख्या में किसान राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन करने जा रहे थे। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ शुक्रवार को दिल्ली की सड़कों पर उतरे हैं। इस प्रदर्शन में दक्षिण भारत व छत्तीसगढ़ के किसान भी अपने-अपने राज्‍यों में विरोध-प्रदर्शन करके शामिल होंगे। कयास लगाए जा रहे थे कि किसान संगठन दिल्ली के पॉश इलाकों में अपना प्रदर्शन करते।

बिचौलिए और सरकारी अधिकारियों की लूटखसोट 

हर जगह बिचौलिए हैं। खुद सरकारी अध‍िकारी इनसे मिले हुए हैं। ऐसे में किसान तक फायदा पहुंच ही नहीं पा रहा। सरकार ने डीजल के दाम बढ़ा दिए। ट्रैक्‍टर में 1 घंटे में 5 लीटर डीजल जल जाता है। ऐसे में आप खुद तय कर लें कि किसान को कितना फायदा हो रहा होगा। किसानी अब घाटे का सौदा हो चला है।''

यात्रा में कई किसान ऐसे भी हैं जो सरकारी योजनाओं के उन तक न पहुंचने से नाराज हैं। कुछ किसानों की प्रतिक्रियाएं, वो कहते हैं मुझे आवास नहीं मिला। प्रधान इसके लिए पैसे मांग रहा है, हम पैसे कहां से लाएं। इसके अलावा सरकारी गल्‍ले की दुकान को लेकर भी कई लोग नाराजगी जता रहे हैं। लोग कोटेदार की मनमानी को लेकर भी बात करते हैं।

किसानों पर रबड़ बुलेट, आंसू गैस

इन किसानों को रोकने के लिए क़रीब एक हज़ार सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं. हालांकि किसानों और सुरक्षाबलों की संख्या को लेकर दोनों ही पक्ष कोई सही तस्वीर सामने नहीं रखते हैं. राकेश टिकैत कहते हैं, ''संख्या का क्या है जी. हम कोई गिनने थोड़ी जा रहे हैं.'' सुरक्षाबलों की सही संख्या बॉर्डर पर बताने से ज़्यादातर अधिकारी बचते दिखे. लेकिन ये संख्या इतनी तो थी कि कुछ जगहों पर किसान कम और रेपिड एक्शन फोर्स या पुलिस के लोग ज़्यादा नज़र आ रहे थे. किसानों की इस रैली का मिज़ाज सुबह पुलिस की फायरिंग के बाद कुछ बदला. जो किसान अब तक अपनी मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे, अब उनकी आवाज़ और बातों में आक्रोश था.

मीडिया के कैमरों को देखते हुए वो ये कहने से ना चूकते- ये नेता हमारी बातें कर-करके दिल्ली पहुंच लेते हैं, लेकिन हमारी मांगों को सुनने के लिए हमें दिल्ली में नहीं आने देते, उल्टा हमारा ही खून बहाते हैं. मेरठ के एडीजी (ज़ोन) प्रशांत कुमार बताते हैं, ''यूपी पुलिस की ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस ने कुछ आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, रबड़ बुलेट फायर किए गए हैं. कुछ किसानों का कहना है कि फायरिंग की गई है, जांच के बाद चीज़ें बेहतर तरीके से पता चलेंगी. किसानों के आरोपों की जांच की जाएगी.''जिन किसानों के पैरों में चोट आई है, वो अपने ज़ख़्मों के साथ उस फ्लाईओवर के नीचे लेटे हुए हैं, जो यूपी और दिल्ली को बांटती है. पुलिस की ओर से इलाज के लिए उठने की बात कहने पर किसान पुलिस पर गरजते नज़र आते हैं.

हालांकि ज़मीन पर अन्न उगाने वाले किसानों की इस लड़ाई में बुनियादी फर्क पुलिस बैरिकेट्स के दोनों तरफ़ देखा जा सकता है. जहां एक तरफ़ सुबह से ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले खाने की लाइन में लगे नज़र आते हैं और दूसरी तरफ़ टुकड़ियों में बैठे किसान अपने-अपने बस्ते से रोटी आचार निकालकर खा रहे थे.

क्यों प्रदर्शन कर रहे किसान 

68 किसान संगठनों की मांग है कि जितने भी राज्यों में किसानों पर कर्ज है उसे केंद्र और राज्य सरकार माफ करें। इसके साथ ही उनकी मांग हैं कि वर्ष 2006 केंद्र सरकार की ओर से एमएस स्वामीनाथन की जी रिपोर्ट आई थी, उसे लागू किया जाए, ताकि किसानों के आर्थिक हालात सुधर सके।

किसानों की अहम मांगें क्या हैं?

इस रैली में आप किसी भी राज्य से आए किसान से उनकी मांगों के बारे में पूछें तो स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों का ज़िक्र ज़रूर करते हैं. अब से 14 बरस पहले 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 'नेशनल कमिशन ऑन फ़ॉरमर्स' बना था. इस आयोग ने किसानों की बेहतरी के लिए कुछ सिफारिशें की थीं, जिनका ज़िक्र संभवत: सिर्फ़ चुनावी मंचों पर हुआ. फ़सल उगाने वाले किसान के लिए ज़मीन पर हालात नहीं बदले.

क्या थी किसानों के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें?

किसानों की भलाई की बात सामने आते ही सबसे पहले स्वामीनाथन रिपोर्ट सभी के जहन में आती है. किसान संगठन हर बार स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग करते रहे हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार ने किसानों के हक में बड़ा फैसला लिया है. सरकार की ओर से खरीफ की फसलों के दामों में एमएसपी के ऐतिहासिक बढ़ोतरी की गई है. किसानों की भलाई की बात सामने आते ही सबसे पहले स्वामीनाथन रिपोर्ट सभी के जहन में आती है. किसान संगठन हर बार स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग करते रहे हैं. 

आखिर क्या थी वह स्वामीनाथन रिपोर्ट...

प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन को देश में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है. स्वामीनाथन जेनेटिक वैज्ञानिक हैं. तमिलनाडु के रहने वाले इन वैज्ञानिक ने 1966 में मेक्सिको के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के संकर बीज विकिसित किए. यूपीए सरकार ने किसानों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक आयोग का गठन किया जिसे स्वामीनाथन आयोग कहा गया.

बदल जाती किसानों की हालत

दरअसल, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को आज तक लागू नहीं किया जा सका. कहा जाता है कि अगर इस रिपोर्ट को लागू कर दिया जाए तो किसानों की तकदीर बदल जाएगी. अनाज की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के मकसद से 18 नवंबर 2004 को केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था. इस आयोग ने पांच रिपोर्ट सौंपी थीं.

भूमि सुधार की अनुशंसा

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर दिया गया. अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि है.

आत्महत्या रोकने की कोशिश

आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है. यदि इसे लागू किया जाए तो किसानों की स्थिति में काफी सुधार की संभावना है.

तो बढ़ जाती किसानों की आय

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही इसका मकसद है. किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र और बाजार का दखल स्कीम भी लांच करने की सिफारिश की गई है.

सिफारिशों की मुख्य बातें

  • फसल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले.
  • किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाएं.
  • गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए.
  • महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं.
  • किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके.
  • सरप्लस और इस्तेमाल नहीं हो रही ज़मीन के टुकड़ों का वितरण किया जाए.
  • खेतीहर जमीन और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कॉरपोरेट को न दिया जाए.
  • फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले.
  • खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद तक पहुंचे.
  • सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके चार फीसदी किया जाए.
  • कर्ज की वसूली में राहत, प्राकृतिक आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज से राहत हालात सामान्य होने तक जारी रहे.
  • लगातार प्राकृतिक आपदाओं की सूरत में किसान को मदद पहुंचाने के लिए एक एग्रिकल्चर रिस्क फंड का गठन किया जाए.
स्वामीनाथन आयोग की ये सिफारिशें अब तक सरकारी फाइलों में ही सीमित हैं. प्रदर्शन में बैठे राकेश टिकैत कहते हैं, ''गन्ना भुगतान को 14 दिन में करने का वादा था. आठ महीने हो गए, कुछ न हुआ. 10 साल पुराने ट्रैक्टर बंद कर दिए हैं. देश के संगठन अलग हो सकते हैं, लेकिन सारे किसानों के मुद्दे एक ही हैं. अभी किसानों का दर्द है. भारत सरकार डॉक्टर है. इलाज के लिए आए हैं. दवाई लेने आए हैं, लेकिन दवाई नहीं मिल रही है. हमारी मांगें केंद्र सरकार से ज़्यादा है. आश्वासन चार साल से मिल रहे हैं, लेकिन काम नहीं हो रहा. सरकार कोई भी हो, ढंग का काम नहीं हो रहा.''

पंजाब से यूपी तक एक सी हैं किसानों की समस्‍याएं

एक बीघे में गन्‍ना तैयार करने में 10 हजार रुपए लगते हैं। इसमें सिंचाई, खाद, बीज, गन्‍ने की बंधाई सब शामिल है। इसके ऊपरहमारी मेहनत भी है। इतनी मेहतन के बाद खेत में लगभग 60 कुंटल गन्‍ना तैयार होता है। अब चीनी मिल वाले 1 बीघा में 40 कुंटल ही गन्‍ना लेते हैं, वो भी 316 रुपए कुंटल के हिसाब से। ऐसे में हमें 12640 रुपए मिले। 1 बीघे में साल भर की मेहनत से बचे सिर्फ 2640 रुपए। ऊपर से 20 कुंटल फसल का क्‍या होगा ये भी नहीं पता। ये है किसान का हाल।''

एक दुकानदार के पास दो ग्राहक जाते हैं, एक नकद में सामान लेता है और दूसरा उधार में। किस ग्राहक की ज्‍यादा पूछ होगी?'' इस सवाल का जवाब हैं, ''जो नकद में सामान लेगा उसकी ज्‍यादा पूछ है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करती। किसान आपसे कर्ज लेकर समय पर लौटा रहा है। इस पर भी आप उसे परेशान करते हैं। लेकिन बड़ी कंपनियों को, बड़े लोगों को आप बुला बुलाकर कर्ज दे रहे हैं। पहला कर्ज चुकाया नहीं फिर भी कर्ज दे रहे हैं। ये है किसान की असल समस्‍या।''  किसानी से इतना भी नहीं निकल रहा कि अच्‍छे से घर चल सके। आज डीजल के दाम भी बढ़ा दिए हैं। किसान  की जमीन पर कुछ भूमाफियाओं ने कब्‍जा कर लिया है। वो अधिकारियों के चक्‍कर लगा-लगाकर परेशान हो चुके हैं। दबंग जो चाहे वो ही हो रहा है।
 
मान लेते हैं देश का किसान बहुत खुश है। आप (सरकार) एक खुशी उसे और दे दीजिए, हमें 20-22 हजार रुपए महीना दीजिए। इसके बाद सरकार आकर खुद खेती करे। जो फसल चाहे उगा ले। आखिर बैंक में काम करने वाले, सरकारी कर्मचारियों को आप सैलरी तो देते ही हैं, हमें भी दे दीजिए।'' मान लेते हैं देश का किसान बहुत खुश है। आप (सरकार) एक खुशी उसे और दे दीजिए, हमें 20-22 हजार रुपए महीना दीजिए। इसके बाद सरकार आकर खुद खेती करे। जो फसल चाहे उगा ले। आखिर बैंक में काम करने वाले, सरकारी कर्मचारियों को आप सैलरी तो देते ही हैं, हमें भी दे दीजिए।''

किसानों की रैली पर सियासी प्रतिक्रियाएं...

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ किसानों की रैली में हिंसा के कुछ घंटे बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं. केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, ''हमने क़र्ज़माफ़ी की. मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है. यूरिया की कालाबाज़ारी रुकी है. किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है. सालों से उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है. किसानों को भारी राहत मिली है.''

किसान यूनियन कहती है, ''कई महीने का पेमेंट रुक रहा है. बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया. हम हटेंगे नहीं. दिल्ली जाए बिना मानेंगे नहीं. हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली.'' किसान रैली में आए किसान कहते हैं, ''झूठ बोलने के अलावा कोई काम नहीं है. किसानों का शोषण करते हैं. हम इस सरकार को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हम तो सरकार के भंडे कर देंगे. मोदी सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरा नहीं किया. कर्जमाफी का वादा किया था, वो पूरा नहीं हुआ, पंजाब में हर रोज़ पांच किसानों की मौत होती है. गन्ना के बकाया तक नहीं चुकाया.'' 'अपना हक लेकर रहेंगे' नारा लगाते इन किसानों की शिकायतों का अंबार रुकता नहीं है '। 

''ऐसी लुटाई वाली सरकार आज़ादी के बाद कभी नहीं आई. बिजली के बिल इतने बढ़ा दिए. यूपी का जो मुख्यमंत्री है, इनने ज़्यादा थका लिया. मोदी-योगी की जोड़ी है. बेइमान इकट्ठे हो रहे हैं.'' पास खड़े कई किसान भी कहते हैं, ''शांतिपूर्वक अपनी बात रखने आए थे. रबड़ की गोलियां चला रहे हैं, पानी की बौछार कर रहे हैं. अरे सीने पे गोली चला रहे हैं. बताओ. अपनी गाल बजाई में लगे रहे हैं. बीते चुनाव में इसी मोदी को वोट दिया था जिनको भाजपा भी लिखना नहीं आता था, उनको वोट दे देकर जिताया. अब आने दो 2019, सबक सिखा देंगे. इनका ऐसा बिगुल बजाएंगे कि याद रखेंगे.''

चार साल पहले देश में गांधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था. चार साल बाद इस अभियान की एक तस्वीर यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर किसान रैली से लौटते हुए मिलती है.

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