कोई क्या कहेगा ?


कोई क्या कहेगा ?

खो देते हैं इससे, वे कई पल और खुशियां
जिनसे संवर सकता था, और अधिक
घर-संसार, व्यवहार हमारा।

कोई क्या कहेगा?


पूरी जिंदगी
परवाह करते हैं हम
इस बात की
कि कोई क्या कहेगा?

खो देते हैं इससे
वे कई पल और खुशियां
जिनसे संवर सकता था
और अधिक
घर-संसार, व्यवहार हमारा।

इस एक दंश से
मुरझा जाते हैं कभी-कभी
बेटे और बेटियों के भविष्य
या कई दफा सपने भी हमारे।

देखते और सोचते हैं
अक्सर ही हम इसी रूप में
इस प्रश्न को।
पर मेरी नजर में होता है
एक पहलू और भी इसका
बचाता है यही डर बार-बार
अनेक अप्रिय स्थितियों से भी हमको।

सोचें तो मिलेगा उत्तर यही
सिक्के के दो पहलू की तरह ही हैं
परिणाम भी इसके।

कभी बचाता है तो कभी
डुबाता भी है प्रश्न यह
कि कोई क्या कहेगा?

समझकर इसे
लें अपने विवेक का सहारा
और करें वही
जिसके सुखद हों परिणाम
घर-संसार और व्यवहार में हमारे।
अंत में फिर इतना ही कहूंगा कि यदि जरूरी है लोगों के कहने की परवाह करना तो उतनी ही करें जितनी कि अनुमति आपका विवेक दे।
देवेन्द्र सोनी



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