राष्ट्रीय किसान आयोग


राष्ट्रीय किसान आयोग

राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन 18 नवम्बर 2004 में एम.एस .स्वामीनाथन की अध्यक्षता में किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थापित किया गया है। किसान आयोग अपने अनुसार पैदावार की लागत तय करता है फिर उसके आधार पर मुनाफा निर्धारण करता है। 

राष्ट्रीय किसान आयोग 

(National Commission on Farmers)

राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन 18 नवम्बर 2004 में एम.एस .स्वामीनाथन की अध्यक्षता में किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थापित किया गया है। किसान आयोग अपने अनुसार पैदावार की लागत तय करता है फिर उसके आधार पर मुनाफा निर्धारण करता है। 

राष्ट्रीय किसान आयोग के अन्य सदस्य -
  • अध्यक्ष- प्रो. एम.एस,स्वामीनाथन
  • पूर्ण-कालिक सदस्य- राम बदन सिंह, श्री वाई. सी. नंदा  
  • अंश-कालिक सदस्य- आर.एल. पिटाले, जगदीश प्रधान, चन्दा निम्ब्कर, अतुल कुमार अंजान 
  • सदस्य सचिव- अतुल सिन्हा 

महत्वपुर्ण निर्देश :- 

प्रो. एम.एस.स्वामीनाथन ने दिसम्बर 2004 से अक्टूबर 2006 के कुल पांच रिपोर्ट दिया था| प्रथम चार रिपोर्ट दिसम्बर2004, अगस्त2005, दिसम्बर2005, और अप्रैल2006, में आया था| जिसका अंतिम या फाइनल रिपोर्ट अक्टूबर4, 2006 में,   जिसका मुख्य केंद्र किसानों की दशा और बढ़ती हुई आत्महत्या जैसे गंभीर मामलों पर आधारित था| NCF ने कृषि को संविधान के समवर्ती सूची में शामिल करने का निर्देश दिया था|

आयोग की संस्तुतियाँ

भूमि बंटवारा

आयोग का पहला महत्वपूर्ण बिंदु यही था। जमीन बंटवारे को लेकर इसमें चिंता जताई गई थी। इसमें कहा गया था कि 1991-92 में 50 प्रतिशत ग्रामीण लोगों के पास देश की सिर्फ तीन प्रतिशत जमीन थी। जबकि कुछ लोगों के पास ज्यादा जमीन थी। ऐसे में इसके सही व्यवस्था की जरूरत बताई गई थी।

भूमि सुधार
बेकार पड़ी और अतिरिक्त (सरप्लस) जमीनों की सीलिंग और बंटवारे की सिफारिश की गई थी। इसके साथ ही खेतीहर जमीनों का गैर कृषि इस्तेमाल पर चिंता जताई गई थी। जंगलों और आदिवासियों को लेकर भी विशेष नियम बनाने की बात कही गई थी। साथ ही राष्ट्रीय भूमि-उपयोग सलाह सेवा के स्थापना की बात भी थी। इसका काम परिस्थितिकी, मौसम और बाजार को देखना होता।

सिंचाई सुधार
सिंचाई व्यवस्था को लेकर भी आयोग ने चिंता जताई थी। साथ ही सलाह दी थी कि सिंचाई के पानी का उपलब्धता सभी के पास होनी चाहिए। इसके साथ ही पानी की सप्लाई और वर्षा-जल के संचय पर भी जोर दिया गया था। पानी के स्तर को सुधारने पर जोर देने के साथ ही ‘कुआं शोध कार्यक्रम’ शुरू करने की बात कही गई थी।

उत्पादन सुधार
आयोग का कहना था कि कृषि में सुधार के लिए एक समग्र प्रयत्न की जरूरत है। इसमें लोगों की भूमिका को बढ़ाना होगा। इसके साथ ही कृषि से जुड़े सभी कामों में ‘जन सहभागिता’ / पब्लिक इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी। चाहें वह सिंचाई हो, जल-निकासी हो, भूमि सुधार हो, जल संरक्षण हो या फिर सड़कों और कनेक्टिविटी को बढ़ाने के साथ शोध से जुड़े काम हों।

ऋण और बीमा (इंश्योरेंस)
इसमें कहा गया था कि ऋण प्रणाली की पहुंच सभी तक होनी चाहिए। फसल बीमा की ब्याज-दर 4 प्रतिशत होना चाहिए। कर्ज वसूली पर रोक लगाई जाए। साथ ही कृषि जोखिम फंड भी बनाने की बात आयोग ने की थी। पूरे देश में फसल बीमा के साथ ही एक कार्ड में ही फसल भंडारण और किसान के स्वास्थय लेकर व्यवस्थाएं की जाएं। मानव विकास और गरीब किसानों के लिए विशेष योजना की बात कही गई थी।

खाद्य सुरक्षा
आयोग ने समान जन वितरण योजना की सिफारिश की थी। साथ ही पंचायत की मदद से पोषण योजना को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की भी बात थी। साथ ही स्वयं सहायक समूह बनाकर कम्यूनिटी खाद्य एवं जल बैंक बनाने की बात भी कही गई थी। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के साथ ही गरीब किसानों की मदद को लेकर अन्य योजनाओं के बारे में आयोग ने विस्तार से लिखा था।

किसान आत्महत्या रोकना :
किसानों की बढ़ती आत्महत्या को लेकर भी आयोग ने चिंता जताई थी। इसके साथ ही ज्यादा आत्महत्या वाले स्थानों का चिह्नित कर वहां विशेष सुधार कार्यक्रम चलाने की बात कही थी। सभी तरह की फसलों के बीमा की जरूरत बताई गई थी। साथ ही आयोग ने कहा था कि किसानों के स्वास्थ्य को लेकर खास ध्यान देने की जरूरत है। इससे उनकी आत्महत्याओं में कमी आएगी।

वितरण प्रणाली में सुधार
इसे लेकर भी आयोग ने कई सिफारिशें की थी। इसमें गांव के स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पूरी व्यवस्था का खांका खींचा गया था। इसमें किसानों को पैदावार को लेकर सुविधाओं को पहुंचाने के साथ ही विदेशों में फसलों को भेजने की व्यवस्था थी। साथ ही फसलों के आयात और उनके भाव पर नजर रखने की व्यवस्था बनाने की सिफारिश भी थी।

प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाना
आयोग ने किसानों में प्रतिस्पर्धा (कंपटीटिवनेस) को बढ़ावा देने की बात कही है। इसके साथ ही अलग-अलग फसलों को लेकर उनकी गुणवत्ता और वितरण पर विशेष नीति बनाने को कहा था। न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने की बात कही गई थी।

रोजगार सुधार
खेती से जुड़े रोजगारों को बढ़ाने के लिए बातें कही गई थी। आयोग ने कहा कि सन 1961 में कृषि से जुड़े रोजगार में 75।0 प्रतिशत लोग लगे थे जो कि 1999 से 2000 काफी कम 59।9 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसके साथ ही किसानों के लिए ‘नेट टेक होम इनकम’ को भी तय करने की बात कही गई थी।

अन्य उदाहरण :-   

  • 1956 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना की गयी थी।
  • चीनी उद्योग में तकनिकी कुशलता के सुधार हेतु इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ शुगर टेक्नोलॉजी की स्थापना कानपुर में की गयी है।
  • चीन के बाद भारत विश्व में प्राकृतिक रेशम का दूसरा बड़ा उत्पादक राष्ट्र है। भारत में प्रथम रेशम उत्पादक राज्य कर्नाटक है। 
  • हीरापुर में पीग आयरन का उत्पादन होता है, जिसे स्टील के उत्पादन हेतु कुल्टी भेजा जाता है । 
  • राष्ट्रीय किसान आयोग का लक्ष्य यह कि सबसे पहले खेती को कैसे लाभ का पेशा बनाया जाए तथा पढ़े-लिखे लोग भी इसमें आएं इस पर उसे ध्यान केंद्रित करना होगा। 
  • दूसरे, किसानों का जीवन-स्तर ऊंचा उठे, उनके परिवार को खेती से कैसे व्यवस्थित जीवन जीने का आधार मिले।
  • राष्ट्रीय किसान आयोग कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का वाहक बने।
  • राष्ट्रीय किसान आयोग कृषि लागत मूल्य निर्धारण तथा किसानों की पैदावार का मूल्य तय करता है। 
  • खेती को राज्यों का विषय बना दिए जाने के कारण वैसे भी ज्यादा जिम्मेवारी राज्यों की आ जाती है। वास्तव में खेती और किसानों की समस्याओं और आवश्यकताओं पर समग्रता में विचार करने के लिए किसी ढांचागत संस्था के न होने से बड़ी शोचनीय स्थिति पैदा हुई है। 
  • किसान आयोग उसमें उम्मीद की किरण बनकर आ सकता है।
  • खेती का योगदान हमारी समूची अर्थव्यवस्था में भले चौदह-पंद्रह प्रतिशत रह गया है, लेकिन हमारी आबादी के साठ प्रतिशत से ज्यादा लोगों का जीवन उसी पर निर्भर है। चाहे वे सीधे खेती करते हों या खेती से जुड़ी अन्य गतिविधियों में लगे हों। भारतीय अर्थव्यवस्था को इसीलिए तो असंतुलित अर्थव्यवस्था कहते हैं| 
  • उद्योग तथा सेवा क्षेत्र का योगदान पचासी प्रतिशत के आसपास है लेकिन इस पर निर्भर रहने वालों की संख्या चालीस प्रतिशत से कम होगी। 
  • कृषि लागत और मूल्य आयोग तथा लघु कृषक कृषि व्यापार संघ का इसमें या तो विलय कर दिया जाए या फिर उनके मातहत बना दिया जाए। कारण, ये दोनों संस्थाएं किसानों की पैदावार के लागत मूल्य के मूल्यांकन तथा उचित मूल्य दिलवाने में सफल नहीं रही हैं। 
  • देश के सभी किसान संगठनों को मिलाकर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘भारतीय कृषक परिसंघ’ का भी गठन किया जाए जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और कृषिमंत्री रहें। 
  • भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वायदा किया हुआ है कि वह एम. एस. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप किसान को कृषि उपज की लागत पर पचास प्रतिशत लाभ दिलाना सुनिश्चित करेगी। भूमिका  किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ही मिलता है। लाभ या मुनाफा शब्द का कहीं प्रयोग नहीं है। 
  • कृषि उत्पादन आखिर कृषि उत्पादनों के बाजार का नियमन राज्य सरकारों के पास है और इसके लिए हर राज्य का एक कृषि उत्पाद विपणन समिति कानून (एपीएमसी एक्ट) है।
  • कई राज्यों में पहले किसान आयोग बने,वे बंद कर दिये गए। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लीजिए। 19 सितंबर 2006 को आयोग का गठन किया गया था, लेकिन 31 दिसंबर 2010 को ही बंद कर दिया गया।
  • भारतीय किसान संघ ने मांग की कि इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाए या इसे बंद कर दिया जाए। सरकार ने संवैधानिक दर्जा देने यानी अधिकार संपन्न बनाने की जगह इसे बंद कर दिया। 

आयोग की रिपोर्ट :-  

राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट है कि समर्थन मूल्य खेती की लागत से कम होता है, इस कारण खेती घाटे का सौदा बन गई है और देश के 40 प्रतिशत किसान अब खेती छोड़ने को बाध्य हो रहे हैं। 

1925 में 10 ग्राम सोने का मूल्य 18 रुपए और एक क्विंटल गेहूं 16 रुपए का होता था। 1960 में 10 ग्राम सोना 111 रुपए और एक क्विंटल गेहूं 41 रुपए का था। वर्तमान में 10 ग्राम सोने 32000 रुपए का और एक क्विंटल गेहूं 1285 का है। 

1965 में केंद्र सरकार के प्रथम श्रेणी अधिकारी के एक माह के वेतन मंश छह क्विंटल गेहूं खरीदा जा सकता था, आज उसके एक माह के वेतन में 30 क्विंटल गेहूं खरीदा जा सकता है।

नोट :- 
  1. स्वयंसेवी संगठन ‘सिटीजन्स रिसोर्स ऐंड एक्शन ऐंड इनीशिएटिव’ की ओर से दायर की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह बेहद गंभीर मसला है। 
  2. उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से, यानी पिछले ढाई दशक में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
  3. मौसम की मार या किसी अन्य कारण से जब फसल चौपट होती है या पैदावार कम होती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, या जब पैदावार खूब होती है तब भी अक्सर वाजिब दाम न मिल पाने के कारण वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। न सिर्फ राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा लगातार घटता गया है बल्कि तमाम अन्य पेशों के मुकाबले कृषि आय बहुत ही कम बढ़ी है।
  4. मानसून की विफलता सूखापन, बेहतर कीमतों की कमी और भारत भर में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं की एक श्रृंखला के लिए नेतृत्व किया है, जो सभी के बिचौलियों द्वारा किसानों के शोषण की एक श्रृंखला को जन्म दे सकता है।
  5. भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने और किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने का वादा किया था। मगर केंद्र की सत्ता में आने के करीब तीन साल बाद भी उसने इस दिशा में कुछ नहीं किया है। यही नहीं, विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी पहले के मुकाबले बहुत कम बढ़ोतरी हुई है।
  6. चीनी मिलों पर गन्ने का बकाया इसका सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है। कृषि और किसानों का संकट में होना हमारी अर्थव्यवस्था के एक बड़े क्षेत्र का संकट में होना तो है|
  7. 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट 'एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015' के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है| और साल 2014 में 12,360 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने खुदकुशी कर ली| 
  8. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 12,602 लोगों में 8,007 किसान थे जबकि 4,595 खेती से जुड़े मजदूर थे| साल 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और खेती से जुड़े मजदूरों की संख्या 6,710 थी|
  9. महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसानों ने की आत्महत्या  किसानों के आत्महत्या के मामले में सब से बुरी हालात महाराष्ट्र की है| 
  10. 2015 में महारष्ट्र में 4,291 किसानों ने आत्महत्या की|
  11. कर्नाटक में साल 2015 में 1,569 किसानों ने आत्महत्या कर ली| तेलंगाना (1400) मध्य प्रदेश (1290) छत्तीसगढ़ (954) आंध्र प्रदेश (916) तमिलनाडु (606)


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