बदलता खानपान बढ़ाता बीमारियां


बदलता खानपान बढ़ाता बीमारियां

मैदे और तेल से बने ये जंक फूड हमारी पाचन क्रिया को भी प्रभावित करता है। इससे कब्ज की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इन खानों में फाइबर्स की कमी होने की वजह से भी ये खाद्य पदार्थ पचने में दिक्कत करते हैं। ज्यादा से ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करने वाले लोगों में 80 फीसदी दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। 

बदलता खानपान बढ़ाता बीमारियां 

बदलती जीवनशैली ने देश भर में लोगों के खान-पान में बदलाव ला दिया है।  सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि करीब 70 फीसदी लोग मांसाहारी हो चुके हैं वडा पाव, समोसा, पिज्?जा,बर्गर, रोल, चौमिन, चिली, फैंच फ्राइ और कोल ड्रिंक्स आदि ने लोगों की खानपान पर कब्जा कर लिया है। आज लोग पौष्टिक आहार को कम फास्ट फूड या जंक फूड को ज्यादा तवज्जों देने लगे हैं। लेकिन जंक फूड हमारी ¨जदगी को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं आपको अंदाजा नहीं है। एक शोध की माने तो जंक फूड खाने से दिमाग में गड़बड़ी पैदा होने लगती है। निरंतर फास्ट फूड के सेवन से आप शिथिल होते जाते है। हम खुद को थका हुआ महसूस करने लगते हैं। आवश्यक पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट की कमी की वजह से फास्ट फूड आपकी उर्जा के स्तर को कम कर देता है। जंक फूड का लगातार सेवन टीनेजर्स में डिप्रेशन का कारण बन सकता है। बढती उम्र में बच्चों कई तरह के बायोलॉजिकल बदलाव आने लगते हैं। जंक फूड जैसे चौमिन, पिज्जां,बर्गर, रोल खाना बढते बच्चों के लिए एक समस्या बन सकता है और वह डिप्रेशन में भी जा सकता है।

मैदे और तेल से बने ये जंक फूड हमारी पाचन क्रिया को भी प्रभावित करता है। इससे कब्ज की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इन खानों में फाइबर्स की कमी होने की वजह से भी ये खाद्य पदार्थ पचने में दिक्कत करते हैं। ज्यादा से ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करने वाले लोगों में 80 फीसदी दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। 

इस तरह के आहार में ज्यादा फैट होता है जो कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर में भी योगदान देता है। वसा से भरपूर खाद्य पदार्थ हृदय, रक्त वाहिकाओं, जिगर जैसे कई बीमारियों का कारण हैं। इससे तनाव भी बढ़ता है। कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ (कॉफी, चाय, कोला और चॉकलेट), सफेद आटा, नमक, संतृप्त वसा, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ ये कुछ ऐसी चीजें है जो तनाव को बढ़ाने में मदद करती है। स्वस्थ जीवन जीने के लिए खान-पान व दिनचर्या पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। हमारा संतुलित आहार ही स्वस्थ जीवन का आधार है, क्योंकि खान-पान में गड़बड़ी होगी तो हमारे जीवन में उसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा ।

स्वास्थ्य से खिलवाड़

बदलती जीवनशैली ने देश भर में लोगों के खान-पान में बदलाव ला दिया है।  सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि करीब 70 फीसदी लोग मांसाहारी हो चुके हैं। अब खानपान को परंपराओं और जाति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। ताज्जुब तो यह है कि ऐसे लोग जिनका खानपान बदला और बदल रहा है, उन्हें यह जानकारी तक नहीं होती कि वे किस प्रकार का आहार ले रहे हैं। बस, स्वाद के लिए क्या बेहतर है, इसकी समझ है लेकिन सेहत के लिए क्या खाना जरूरी है और क्या नहीं, इसकी जानकारी अधिकतर को शायद नहीं है। क्यों आया समाज में ऐसा बदलाव? कैसे होता है स्वास्थ्य से खिलवाड़? कैसे बचा जा सकता है इनसे।

नींद न आना भी चिंता का कारण 

भागदौड़ भरी जिंदगी और बीमारियों से घिरे माहौल में बेहतर नींद न आना भी चिंता का एक बड़ा कारण है. अगर आप 8 घंटे से कम सोते हैं, तो भविष्य में आपके लिए कई तरह की परेशानियों खड़ी हो सकती हैं. नींद पूरी न होने से आप थकते ही नहीं बल्कि इससे आप के शरीर के कई हिस्सों पर बुरा असर भी पड़ता है. मुख्यत दिमाग पर. ये भी सच है आप तरह-तरह की एक्सरसाइज करते होंगे, ताकि चैन की नींद ले सकें, पर क्या आपको पता है कि खान-पान के कुछ तरीकों को अपनाने से नींद न आने की बीमारी को दूर किया जा सकता है. 
  • गर्म दूध - आर्युवेद में भी कहा गया है कि गर्म दूध नींद पूरी करने में काफी मदद करता है. दूध में ट्रिप्टोफैन होता है, जो अमीनो एसीड को सेरोटोनिन में बदल देता है. दरअसल, सेरोटोनिन हमारे दिमाग को प्रभावित करता है और नींद आने में भी मदद करता है.
  • चैरी - चैरी पीले से तेकर लाल तक अलग-अलग शेड्स में आती है पर लाल चैरी में सबसे ज्यादा विटामिन होते हैं. यह विटामिन A, B, C ,E और मिनरल्स से भरपूर होती हैं. रोज 10 से 12 चैरी खाने से नींद अच्‍छी आती है.
  • बादाम - यह प्रमाणित है कि बादाम दिमाग को मजबूत करने में अहम रोल निभाता है. जाहिर-सी बात है कि  नींद का सीधा कनेक्शन दिमाग से होता है, इसलिए रोज करीब 8 बादाम खाना बेहद जरूर खाएं.
  • डार्क चॉकलेट - एक रिसर्च में सामने आया है कि लिमिट में डार्क चॉकलेट खाने से नींद न आने की बीमारी को दूर किया जा सकता है. डार्क चॉकलेट दिमाग को शांत करती है, जिससे नींद टाइम पर पूरी की जा सकती है. हालांकि, यह भी कहा गया है कि इसका जरूरत से ज्यादा सेवन नुकसानदायक होता है.
  • केले - केले भी आपकी नींद न आने की परेशानी को दूर करने में काफी हद तक सक्षम माने जाते हैं. केले में मैग्नीशियम और पोटेशियम होता है, जो मांसपेशी को आराम देता है.

पौष्टिक भोजन देता है हमारे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान

हमारे देश और विदेश के भोजन में तुलना करें तो हमारी शाकाहार और मांसाहार की परिभाषाओं मे ही काफी अंतर है। परेशानी यह भी है कि ऐसा ही अंतर हमारे देश में भी है। कुछ लोग अंडों को मांसाहार में शामिल करते हैं तो कुछ शाकाहार में। इसी तरह बंगाल में ब्राह्मण समाज के बहुत से लोग मछली को शाकाहार में मानकर उसका उपभोग करते हैं। ऐसे में शाकाहार और मांसाहार की सार्वभौमिक परिभाषा पर मतभेद होने से भी आंकड़ों पर असर पड़ता है।

भोजन की आदत खासतौर पर शाकाहारी और मांसाहारी के संदर्भ में भारत सरकार की ओर से जो आंकड़े जारी किए गए हैं,उनकी सत्यता को लेकरं इसीलिए कुछ संदेह होता है। आंकड़े जुटाने की कार्यशैली और उसके निष्कर्ष पर कोई संदेह नहीं है बल्कि संदेह का कारण हमारे समाज का ताना-बाना है। इसी ताने-बाने में के चलते हमें इस तरह की सच्चाई का सही-सही पता नहीं चल पाता कि कोई वास्तव में शाकाहारी है या मांसाहारी। वर्तमान परिस्थितियां कुछ इस तरह से बन गई हैं कि आप किसी जाति-समाज के आधार पर तय नहीं कर सकते कि उस विशिष्ट जाति या समाज का व्यक्ति मांसाहारी ही होगा या शाकाहारी ही होगा।

समाज स्तर के लिए झूठ

भारतीय समाज में सामाजिक स्तर बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई बार बेहतर समाजिक स्तर के लिए बहुत लोग झूठ बोल देते हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात में क्षत्रियों को छोड़कर अन्य सवर्ण कही जाने वाली जातियां आमतौर पर मांसाहारी नहीं हैं। लेकिन, कुछ जातियां जो सवर्ण नहीं हैं और परंपरागत तौर पर वे मांसाहारी रही हैं लेकिन अब उनका सामाजिक स्तर बेहतर होने से वे खुद को शाकाहारी के तौर पर ही घोषित करती हैं। ऐसे में सच्चाई को पकड़ पाना बहुत कठिन हो जाता है। कई बार ऐसा भी देखने और सुनने में आता है कि कुछ परिवार परंपरागत रूप से शाकाहारी हैं लेकिन चिकित्सकीय कारणों से उस परिवार के किसी बच्चे को चिकित्सक पूर्ण रूप से मांसाहार नहीं तो अंडों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। ऐसे में बच्चों को अंडा खिलाने के कारण पूरे परिवार को ही मांसाहारी मान लिया जाता है।

इसी तरह बहुत से परिवारों में कोई एक सदस्य ऐसा भी होता है कि जो मांसाहार नहीं लेता लेकिन उसकी गिनती भी मांसाहारियों में हो जाती है। कभी-कभी जाने-अनजाने में भी लोग मांसाहार का उपभोग करने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सभी को पता है कि पुडिंग में और बहुत बार केक को तैयार करने में अंडे का इस्तेमाल होता है। कई बार पुडिंग खाने वाले इस बात से अनजान होते हैं तो कई बार वे अनजान बने रहने का नाटक भी करते हैं कि उन्हें पता ही नहीं और वे शाकाहारी होने का दावा भी करते हैं। ऐसे में स्पष्टता नहीं होती।

विदेशी व्यंजन और दावा 

हमारा देश बहुत बड़ा है और अब तो लोग रोजगार के उद्देश्य से सरलता के साथ एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाते हैं। ऐसे में लंबे समय में खान-पान की आदतें बदलना बहुत ही स्वाभाविक भी है। गुजरात का व्यक्ति पंजाब में जाकर पंजाबी भोजन पसंद करने लगता है। उत्तर प्रदेश का व्यक्ति दक्षिण भारत में जाकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों को खाने की आदत डाल लेता है। दक्षिण भारतीय लोग राजस्थान आकर वहां के व्यंजनों को पसंद करने लगते हैं।

बंगाल के लोग गुजरात आकर वहां का खाना अच्छा लगने लगता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक नई बात भी देखने को मिल रही है कि यहां लोग इटालियन, मैक्सिकन के साथ चाईनीज और थाई फूड को भी बेहद पसंद करने लगे हैं। खासतौर पर नई पीढ़ी को नए-नए स्वाद लेने में लुत्फ आता है। तरह-तरह के रेस्तरां और फास्टफूड चेन आ गई हैं। अक्सर यहां जाने वाले लोग झिझक के चलते कई बार पूछ भी नहीं पाते कि जो विदेशी व्यंजन वे खा रहे हैं, उसकी आधारभूत सामग्री किससे बनी है। वे शाकाहारी भी हो सकती हैं और मांसाहारी भी। लेकिन, शाकाहारी सी दिखने वाली खाद्य सामग्री को खाने वाले अकसर दावा यही करते हैं कि वे शाकाहारी हैं। ऐसे में इस तरह दावों के आधार पर बने आंकड़ों को स्वीकार करने में कुछ झिझक महसूस होती है।

बढ़ती बीमारियों का खतरा 

तीन बड़े कारण है जो जंक  फूड को खतरनाक बनाते हैं। पहला यह कि इनमें प्रोसेस्ड चीज होती है, दूसरा फेट ज्यादा होता है और तीसरी बात यह कि जंक फूड में केलोरी ज्यादा होती है। हम देख रहे हैं कि इन तीनों की कारणों से घर का खाना खाने के बजाए वे लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होते हैं जिनमे खान-पान में जंक फूड ज्यादा होता है।

इस तरह के खान पान का नतीजा मोटापे को बढ़ाने वाला होता है। बर्गर, पिज्जा, समोसा के साथ-साथ कोल्ड ड्रिंक्स भी सेहत के लिए खतरनाक है। जंक फूड ने हमें खाने में पोषक तत्वों से दूर कर दिया है। बच्चों के मामले में तो ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि उनको शुरू से ही पोषक तत्व नहीं मिल पाएंगे तो रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी कमी होगी ही। हाल ही एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि तीस फीसदी अमरीकी ओवरवेट हैं।  भारत में भी जंक फूड ने जिस तरह से पैर पसारना शुरू किया है वह भी चिंता का कारण है। दिल्ली में हुए एक अध्ययन में पता चला कि स्कूल जाने वाले बच्चों में तीस फीसदी ओवरवेट हैं।

जीवनशैली जिम्मेदार

जंक फूड के प्रति ज्यादा आश्रित होना बीमारियों को न्योता दे रहा है। अत्यधिक चिकनाई व वसा युक्त भोजन से लीवर में फेट बढ़ जाता है। इनमें प्रोटीन की मात्रा तो लगभग होती ही नहीं जो सेहत के लिए ज्यादा जरूरती है। शुगर, ब्लड प्रेशर व ह्रदय रोग जैसी घातक बीमारियां इसी दूषित खान-पान का नतीजा है। शुगर की बढ़ती मात्रा मोटापे को बढ़ाने वाली होती है और मोटापा ही एक तरह से कई तरह की बीमारियों की जड़ है। हम यह भी देख रहे हैं कि न केवल खानपान की आदतों में बदलाव हो रहा है बल्कि लोगों ने आरामदायक जीवनशैली भी अपनाना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने खास तौर से बच्चों व युवाओं को मोबाइल से चिपका दिया है। बचा समय टीवी के सामने बैठे रहने में  बीतने लगा है।  जरूरी है कि अभिभावक भी जीवनशैली में  बदलाव लाएं। 

भारत में पिछले कुछ वर्षो से एक नई बात भी देखने को मिली है। कि यहां के लोग इटालियन, मैक्सिकन के साथ चाईनीज और थाई फूड को भी बेहद पंसद करने लगे है। खासतौर पर नई पीढ़ी को नए-नए स्वाद लेने में लुत्फ आता है। तरह-तरह के रेस्तरां और फास्टफूड (फटाफट खाना) आ गए हैं। अक्सर यहां जाने वाले लोग झिझक के चलते कई बार पूछ भी नहीं पाते कि जो विदेशी व्यंजन वे खा रहे हें, उसकी आधारभूत सामग्री किससे बनी हैं। वे शाकाहारी भी हो सकती हैं और मांसाहारी भी हो सकती है। लेकिन, शाकाहारी सी दिखने वाली खाद्य सामग्री को खाने वाले अकसर दावा यही करते हैं कि वे शाकाहारी है। ऐसे में इस तरह दावों के आधार पर बने आंकड़ों को स्वीकार करने में कुछ झिझक महसूस होती है। 

जंक फूड:- भारत में 8500 करोड़ रुपए का फास्ट फूड (फटाफट खाना) का कारोबार हैं, 2020 तक 25000 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। जंक फूड की श्रेणी में बर्गर, पिज्जा तो आते ही हैं, चिप्स या कैंडी जैसे अल्पाहार भी इसमें गिने जाते हैं। पास्ता मैक्रोनी, चाउमीन, नूडल्स, हॉटडॉट, मोमोज आदि सब जगह आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। जंक फूड के पक्ष में दलील यह दी जाती है कि यह ज्यादा समय तक खराब नहीं होता हैं। इस बाजार के विस्तार का बड़ा कारण लुभावने विज्ञापनों की भरमार भी हैं। 

खिलाओ, बीमार करो और फिर बीमा

बहुत दिनों से अर्थशास्त्री यह कहते आ रहे हैं कि जैसे-जैसे जीवनशैली व आर्थिक स्तर में बदलाव आता जा रहा है लोगो के खान-पान की आदत भी बदलने लगी है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे मीट, अंडे व फास्ट फूड का चलन बढ़ेगा और खाद्यान की खपत कम होने लगेगी। इस माहौल को बनाने के कई कारण हैं। एक तो यह है कि दुनिया की फूड इण्डस्ट्रीज अपनी मार्केटिंग रणनीति के तहत इन प्रयासों में लगी है कि पौष्टिक खाद्य से शिफ्ट होकर लोग फास्ट फूड यानी फटाफट खाने की ओर आकर्षित हों। उनको अपने उत्पाद बेचने हैं इसलिए इसे स्टेटस सिम्बल भी बताया जा रहा है। पाश्चात्य देशों में फूड इण्डस्ट्रीज ने यह बताने का प्रयास किया कि हैवी ब्रेकफास्ट से कार्यक्षमता में इजाफा होता है। अध्ययन में पाया गया कि यह गलत था उल्टा इससे बीमारियों में वृद्धि होने की बातें सामने आई।

बीमारियों में इजाफा

यह बात सच भी है ब्रेकफास्ट में जंकफूड के भारी इस्तेमाल ने दुनिया भर में बीमारियों में इजाफा ही किया है। दरअसल जंकफूड में चीनी का इतना इस्तेमाल होता है कि इसके सेवन से मोटापे की समस्या बढ़ी है। यही कारण में कि अमरीका में तो राष्ट्रपति की पत्नी मिशेल ओबामा ने बच्चों को ब्रेकफास्ट से दूर रखने का अभियान चलाया और वहां की सरकार ने भी इस अभियान में सहयोग किया। हमारे यहां खान-पान नियंत्रित रखने की बातें शुरू से ही कही गई है। दुर्भाग्य से पाश्चात्य देशों में खान-पान की जिन आदतों में बदलाव हो रहा है वे आदतें हमारे यहां बढती जा रही हैं। यहां भी वे ही तर्क दिए जा रहे हैं जो पाश्चात्य देशों में दिए जाते थे। 

बच्चे भी लुभावने विज्ञापनों से आकर्षित होकर जंक फूड इस्तेमाल करने लगे हैं। पश्चिम की फूड इंडस्ट्रीज अपने यहां से बेदखल होती जा रहीं हैं और इन्होंने भारत में बाजार की तलाश शुरू कर दी है। एक हद तक अपने उत्पादों को बाजार में फैलाने में सफल भी हो रहीं हैं। मीट की खपत बढ़ाने का दावा भले ही किया जा रहा हो लेकिन यह ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता खतरा भी है। लाल मांस से भी स्वास्थ्य की समस्याएं हो रहीं है लेकिन ये उद्योग सुनियोजित मार्केटिंग में लगे हैं। अमरीका के सुपर बाजारों में 40 हजार तरह के खाद्य उत्पाद मिलते हैं। 

कई खाद्य प्रसंस्करण उद्योग यहां जिस तरह के जंकफूड तैयार करते हैं उनके खाने से मोटापा और बीमारियां होती हैं। दुनिया के देशों में जीडीपी बढ़ती दिखाने का यह नया तरीका बन गया है। पहले खूब खिलाओ, बाद में बीमार करो। यानी आपके खाने में जितना ज्यादा प्रदूषण होगा उतनी ही जीडीपी बढ़ेगी। इसको यूं समझा जाना चाहिए। पहले फूड इंण्डस्ट्रीज ने बाजार फैलाया तो जीडीपी बढ़ी। बाद में बीमारियां बढ़ी तो दवाइयों का कारोबार करने वाली कंपनियों व इलाज करने वाले अस्पतालों ने जाल फैलाया। इससे जीडीपी बढ़ी। खाकर, बीमार हो गए तो आपकी बीमारी का इलाज कराने के लिए इंश्योरेंस कंपनियां आगे आ गईं। ये तीनों उद्योग आपस में इस तरह से जुड़े हुए हैं।  बीमा कंपनियों ने तो फूड इण्डस्ट्रीज में 4 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है। 

कारोबार का खेल 

हम भले ही यह सोच कर खुश हो रहे हों कि हमारी जीडीपी बढ़ रही है। सच बात तो यह है कि आप जितना जादा खराब फूड खाएंगे इन तीनों उद्योगों के कारोबार में बढ़ोतरी होगी। कारोबारी खेल के इस षडयंत्र को समझना जरूरी है। तय हमें ही करना हैं कि खराब खाना खाकर इस तरह से देश की जीडीपी बढना है या फिर सेहत बनाए रखने के लिए खान-पान की  बदलती आदतों पर रोक लगानी है। समय रहते नहीं चेते जो जंक  फूड से पनपने वाली बीमारियां लोगों की सेहत के लिए लिए बड़ा खतरा बनेंगी।


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