पर्यावरण जागरूकता


पर्यावरण जागरूकता

संतुलन बिगड़ जाता है जब
बनते भूकंप आंधी तूफान सुरसा
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।

पर्यावरण जागरूकता

प्रकृति जमूरा मानव मदारी आओ दिखाएं एक तमाशा ,
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।

ये खनन खुदाई वन पेड़ों की कटाई
ये धुंआ शोर और वायु प्रदूषण
इधर झोपड़ी उधर अट्टालिकाएं
अब जनसंख्या पर न रहा नियंत्रण

संतुलन बिगड़ जाता है जब
बनते भूकंप आंधी तूफान सुरसा
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।

सोलह बसंतो के लिए रंगीन सपने
इक गोरी ने हसरतों की मेंहदी रचाई
सारे चेहरे खिले थे था मंगल ही मंगल
गीत गाती थी महफिल में शहनाई 

पर हाय ! अचानक इक आंधी तूफान आया
सारे खुशियों के आलम को मिट्टी में मिलाया
अभी जिस गांव शहर में था मंगल ही मंगल
अब देखो वहां है लगे लाशों के दंगल

ये जीवन दामिनी प्रकृति देखो बन गयी हो सुरसा
एक ही कौर में कितना निगल गयी उड़ीसा
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।

कहां गयी गलियां कहां गये चैवारे
कहां गयी गांव के बच्चों की टोली
रंग हजार लाया था इक पर देशी बाबू
हाय रे प्रकृति तूने कैसी खेली संग होली

अपने सपने उजड़ गये ऐसा ढाया बवण्डर 
सारे गांव शहर बन गये है समन्दर
तुझे आई न दया उसे बच्चों पर जरा सा
प्रियतम लगता है सारा जहां ये थमा सा
अगर खेल समझ में न आए तो फिर जाना जरा उड़ीसा ।

रमेश चन्द्र सिंह ‘‘प्रियतम‘‘ शिवपुरी फतेहपुर



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